
बस तरीक़ा यही रहा उनका।
इक सलीक़ा नहीं रहा उनका।
हम फ़साने नहीं कहा करते,
सितम हर हाल ही सहा उनका।
बस फ़र्ज़ निभा रहे हम तो,
पर सिला भी नहीं मिला उनका।
इक सहारा न पा सके यारो,
कोई इशारा न मिला उनका।
वो किनारा न दे सके मुझको,
अब भरोसा नहीं रहा उनका।
राज़ दिल के छुपा रखे हमने,
दिल दिया था नहीं रहा उनका।
वो बदलते रहे हवाओं संग,
रुख़ कभी भी न रहा उनका।
हमने चाहा था दिल से उनको पर,
दिल पे क़ब्ज़ा न रहा उनका।
ज़ख़्म दिल के हरे ही रह गए,
मरहम कोई न रहा उनका।
प्रवल अब भी यही कहता है,
दिल फ़रिश्ता नहीं रहा उनका।
रचनाकार
कुँ० प्रवल प्रताप सिंह राणा ‘प्रवल’
7827589250



