साहित्य

मजदूर

सुरेशचन्द्र जोशी

मैं मजदूर हूँ,
पर मजबूर नहीं।
लोगों के रहने के लिए
बड़े बड़े महल,अट्टालिकायें,
सेनाओं के लिए किले,
मैं ही बनाता हूँ।
बड़े बड़े पहाड़ों के हृदय चीर के,
सड़कें भी मैं ही बनाता हूँ।
धरती का सीना फाड़ के,
अन्न के अंबार मैं ही तो लगता हूँ।
सोने,चांदी,लोहे के भण्डार भी,
मैं ही तो निकालता हूँ।
आकाश की ऊंचाई नापने को यान,
समुद्र की गहराई नापने को पनडुब्बी,
मैं ही बनाता हूँ।
कल कारखाने मैं लगाता हूँ,
कपड़ा मैं बुनता हूँ।
दुनिया को एक दूसरे से मिलाने के लिए,
रेलगाड़ियां भी तो मैं ही चलाता हूँ।
कौन सा काम है जो,
मैं नहीं करता हूँ।
इस सबके बदले में क्या पाता हूँ,
मुश्किल से पेट भरने को दो वक्त की रोटी,
बमुश्किल शरीर ढकने को कपड़े,
सिर छुपाने के लिए छत।
न अपना भविष्य सुरक्षित,
न माँ बाप का बुढ़ापा,
न बच्चों का बचपन सुरक्षित।
मैं मजदूर हूँ फिर भी मजबूर नहीं।
इसीलिए पीढ़ी दर पीढ़ी,
दिन और रात,
जाड़ा, गर्मी व बरसात की चिंता के बिना,
कठोर परिश्रम कर समाज देश को,
महान बनाने में जुटा रहता हूँ।।

सुरेशचन्द्र जोशी, उत्तराखंड, पिथौरागढ़।
स्वरचित व मौलिक।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!