
मैं मजदूर हूं
क्या मैं मजबूर हूं ?
सुबह-सुबह खुश होकर निकलता,
काम आज भी मिल जाएगा
प्रभु से हर रोज यह कहता।
जहां बन रहे मकान, दुकान
सड़के या हो रहा कहीं सफेदी का काम।
आश। मुझे काम की बंध जाती,
दिहाड़ी से भी कम मिल जाती, अगर मुझे मजदूरी।
चेहरे पर मेरे छा जाती खुशी पूरी,
आज मैं जो कमा कर घर लाऊंगा ।
भरपेट मिलेगा खाना परिवार को,
भूखा उनको ना सुलाऊंगा।
मेहनत करके खुश हूं आज,
चलते रहे मेरे यह दोनों हाथ।
कमलेश मुद्गल (नई दिल्ली)




