साहित्य

दोहों में मजदूर दिवस

डॉ मंजु गुप्ता

 

‘ कामगार दिन ‘ होय है ,एक मई यह पर्व।

ऑफिस – फैक्ट्री में इन्हें ,मिलती छुट्टी सर्व

अनपढ़ हैं तो क्या हुआ , करते श्रम हैं खूब।

सर्दी , गर्मी ऋतु सभी , रहें काम में डूब ।।

फूले श्रम से दम नहीं , निकले तन से स्वेद।
करें रात दिन श्रम कड़ा , न मजदूर को खेद।।

शारीरिक श्रम वर्ग में , राष्ट्र करे है भेद ।
कम वेतन हैं दे इन्हें , ‘ मंजू ‘ होता खेद ।।

सिर ढकने का है नहीं , घर भी उनके पास।
बनाय औरों के लिए , भवन शहर आवास।।

अगर न हो संसार में , कोई भी मजदूर ।
होते न महल फ्लैट भी , न ही ‘ ताज ‘ – सा नूर ।।

नहीं मिले इज्जत इन्हें , मिलता न पुरस्कार .।
नहीं मिले आवास है , न ही सही आहार।।

तन – मन का गम भूलने , पीते रोज शराब .।
बेच रही सरकार भी , तोड़े ख्वाब जनाब ।।

डॉ मंजु गुप्ता,वाशी ,नवी मुंबई

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