आलेख

मजदूर दिवस

मनीष कुमार श्रीवास्तव

19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति के बाद स्थापित फैक्ट्रियों , कारखानों में अधिक उत्पादन एवं अधिक मुनाफा के दृष्टिगत मजदूरों से 12 से 16 घंटे तक काम लिया जाने लगा। जिससे मजदूरों में पनप रहे भारी असंतोष को देखते हुए दुनिया भर के समाजवादी और श्रमिक संगठनों के अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘सेकंड इंटरनेशनल ‘ने 1 मई 1989 को मजदूर दिवस मनाने का फैसला किया। जिसका आवाहन था ‘8 घंटे फैक्ट्री में काम,8 घंटे आराम और 8 घंटे अपना काम ‘।

19वीं सदी के अंत में भारत में भी कोलकाता ,मुंबई ,मद्रास आदि स्थानों पर नए-नए कल कारखाने लग रहे थ। वास्तव में यह वह संक्रमण काल था जब भारत में लघु एवं कुटीर उद्योग एक तरफ समाप्त हो रहे थे और दूसरी तरफ बड़ी फैक्ट्रियां स्थापित हो रही थी। जिससे भारतीय कामगारों का एक बड़ा हिस्सा कृषक ,कृषक श्रमिक एवं स्वरोजगार से फैक्ट्री मजदूर में बदल रहा था। इस समय दुनिया के महत्वपूर्ण औद्योगिक देशों की भाती भारत में भी मजदूर अत्यंत अल्प एवं अत्यधिक कार्य के घंटे से परेशान था। इसलिए यहां पर भी विरोध प्रदर्शनों का दौर प्रारंभ हो गया।१९१८ में बी पी वाडिया द्वारा सर्वप्रथम मद्रास मजदूर संघ के माध्यम से संगठित मजदूर आंदोलन प्रारंभ किया गया इस क्रम में१९१८ में महात्मा गांधी द्वारा चलाया गया अहमदाबाद मिल आंदोलन मिल मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए सचेत होने तथा संगठित होने के प्रति जागरूक कर गया। १९२० में स्थापित भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय ने मजदूर आंदोलन को एक नई ऊंचाई प्रदान की ।०१.०५ १९२३को भारत में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया गया।

मजदूर दिवस मनाने का उद्देश्य दुनिया को यह समझाना था कि दुनिया जिस समृद्धि और संपन्नता का रास्ता बनाना चाहती हैं, वह मजदूरों के श्रम और प्रयास से ही संभव है। इसलिए मजदूरों की भी मानवीय परिस्थितियों पर चिंतन किया जाना उद्योग कार्य के हिस्से के रूप में देखना चाहिए। इसलिए मजदूरों को उचित पारिश्रमिक और उचित कार्य की अवधि निर्धारित किया जाना न केवल मजदूरों की उचित मांग थी, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के लिए नितांत अपेक्षित भी था।

मजदूर आंदोलनों के इस कड़ी में पूरब के मैनचेस्टर कहे जाने वाले कानपुर में जहां १९८० के दशक में उद्योग धंधों ने दम तोड़ना शुरू किया था ९० के दशक आते आते उद्योग नगरी के रूप में अपनी पहचान को लगभग खो दिया। इस दुर्भाग्यपूर्ण नतीजे के बहुत से कारणों में से एक कारण लगातार हो रहे धरना प्रदर्शन एवं मजदूर आंदोलन भी थे।
इसलिए भारतीय मजदूर संघ का यह लोकप्रिय नारा अत्यंत महत्वपूर्ण है “देश के हित में करेंगे काम , काम का लेंगे पूरा दाम “।

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