
प्रकृति की गोद में जीवन का मधुर विस्तार,
हर पत्ता, हर कण बोले संतुलन का सार।
नदियाँ बहती शांत, सागर से मिल जातीं,
सीख यही देतीं, सीमाएँ अपनातीं।
पर्वत अडिग खड़े, नभ को छूने को तत्पर,
पर धरती से जुड़े, संतुलन के हैं पथिक अमर।
सूरज देता ताप, चंद्र शीतलता लाता,
दिन-रात का क्रम जग में संतुलन सिखाता।
पवन कभी मंद, कभी प्रबल झोंके लाए,
पर हर रूप में जीवन के दीप जलाए।
ऋतुएँ बदल-बदल कर संदेश सुनातीं,
अति हर चीज़ की हानि ही बतलातीं।
जब मानव सीमा अपनी भूल जाता है,
प्रकृति का संतुलन डगमगा जाता है।
कटते वन, सूखती नदियाँ, रोता आकाश,
स्वार्थ में खोकर भूल रहा जीवन का प्रकाश।
आओ फिर से प्रकृति संग नाता जोड़ें,
संतुलन के सूत्रों को जीवन में मोड़ें।
हरियाली, जल, नभ का मान बढ़ाएँ,
धरती को फिर से स्वर्ग बनाएं।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




