
वह एक ऊन का गोला है,
अधूरी इच्छाओं का,
जिसे समय की सिलाइयों पर
हम रात-भर बुनते हैं।
एक फंदा सीधा, एक उल्टा बिल्कुल वैसा ही,
जैसे वह पहली उम्मीद थी,
जो अब कलाई के पास से
थोड़ी उधड़ रही है।
सपने स्वेटर की तरह होते हैं;
बाहर की बर्फी़ली हक़ीक़त
से बचाने के लिए
एक ‘नर्म’ आवरण।
पर ग़ौर से देखो,
तो इनमें अनगिनत सूक्ष्म छेद होते हैं, ताकि आत्मा का दम न घुटे! अजीब है न?
हम उन्हें पहनकर बाहर नहीं निकलते, बल्कि उनके भीतर सिमट जाते हैं।
और जब वे पुराने पड़ते हैं,
तो हम उनके धागे नहीं तोड़ते, बस एक नया गोला ढूँढ लेते हैं! एक और सर्दी,
एक और गर्माहट की आस में।
-डो.दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।




