
धधक रही भू की देहरी, रवि बरसाए अंगारे।
ऐसे में तरु-छाया लगती, जैसे सुख के द्वारे।।
पीपल की दृढ़ डाल बँधा जब, माटी का जल-प्याला।
तृषित विहग को देता जीवन, बन अमृत की हाला।।
शीतल जल से भरे कुंड में, दया सुधा छलकाते।
प्यासे खग दल बनकर आते, मधुर तान सुनाते।।
मैना, सारस, कोयल, चातक, पंख हिलाकर गाते।
निर्मल बूँदों का रस पीकर, हर्षित नभ तक जाते।।
बूँद-बूँद का मर्म यही है, जीवन का आधार।
जल-संरक्षण पुण्य कर्म है, सबसे श्रेष्ठ उपकार।।
आओ मिल संकल्प उठाएँ, करुणा दीप जलाएँ।
प्यासे जीवों हेतु नित प्रतिदिन, जल-पात्र सजवाएँ।।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




