साहित्य

समयचक्र का फेर

डॉ.उदयराजमिश्र

दुख कहने से नीक है,उदय साधिये मौन।
ढलते सूरज को भला,अर्घ्य चढ़ाता कौन।।
अर्घ्य चढ़ाता कौन,समय है सब पर भारी।
आज किसी का दौर,कभी तो तेरी बारी।।
कहें उदय मतिमंद,व्यर्थ में ढूंढे क्यों सुख।
भाग्यकर्म का खेल, मिले प्रासादों में दुख।।

ढूँढ रहे हैं आजकल,बड़े ध्यान से खोट।
बरगद पर भारी पड़ी, डालों की हर चोट।।
डालों की हर चोट,कुल्हाड़ी चुनचुन काटे।
कटती सीधी डाल,कौन टेढ़ी को छांटे।।
कहें उदय मतिमंद,भेद न समझें बुध मूढ़।
भेदी खोजे भेद,नित विज्ञ जनों में ढूंढ।।

उत्तर से दक्षिण गई,भोर हो गई सांझ।
समयचक्र के फेर को,कौन सका है बांच।।
कौन सका है बांच,घड़ी की सूई बोले।
बारह से छह आप,दिवाकर पलपल डोले।।
कहें उदय सुन मीत,आज जो हुए निरुत्तर।
सबका करे हिसाब,समय जब देता उत्तर।।

– डॉ.उदयराजमिश्र
शिक्षाविद/साहित्यकार

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