साहित्य

अरुणिमा का सागर

डाॅ सुमन मेहरोत्रा 'सुरभि'

दूर क्षितिज तक फैला सागर,

लहरों में संगीत जगा,

धीरे-धीरे उगा सूर्य जब,

नभ में लाल सुनहला छा।

 

नीली चादर ओढ़े जल पर,

स्वर्णिम आभा तैर रही,

मंद पवन के मधुर स्पर्श से,

हर लहर जैसे गा रही।

 

अरुण किरण की कोमल रेखा,

आगे बढ़ती जाती है,

धरा गगन के बीच प्रकृति,

नव सौंदर्य बरसाती है।

 

सागर की गहराई में भी,

उजियारा मुस्काता है,

सूरज अपनी प्रथम किरण से,

जीवन पाठ पढ़ाता है।

 

पत्थर तट पर खड़े निहारें,

यह अनुपम अनुपम दृश्य महान,

मन में जागे नई उमंगें,

तन में भर दे नव अभियान।

 

लालिमा अब बिखर चुकी है,

नभ का हर कोना दमके,

जल में पड़ती रश्मि सुनहरी,

मोती जैसे झिलमिल चमके।

 

आओ मिलकर वंदन करें,

इस सुंदर प्रभु उपहार का,

सूर्य नमस्कारों से गूँजे,

हर स्वर प्रेम पुकार का।

 

प्रकृति आज स्वयं कहती है,

जीवन सुंदर साधना,

सागर, सूरज, धरा, गगन में,

बसती ईश्वर आराधना।

 

स्वरचित

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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