
कभी – नारी होती थी
पूज्यनीय-बचपन से बुढ़ापा तक
किन्तु – आज की-नारी- है लाचार
रोज पढ़ो और सुनो -नारी-उठती
बीच बाजार- और होती इज्जत तार तार
कहीं पर फेकते-तेज़ाब- मुँह पर
तो- कहीं पर करते सीमा पार
फिर देते हैं उसको मार
छिपाने को अपना गुनाह
कहीं-कहीं पर होती हैं-वह
घरेलू हिंसा की शिकार
वह भी अपने परिजन बीच
-और-
चढ़ती बलि-वेदी पर वह
कारण होता-दहेज व्यापार
कहीं नहीं है आज सुरक्षित
आज की भोली भाली नारी
अपनों ने अपनों को मारा
फिर भी होती है-नारी-बदनाम
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब
स्वरचित मौलिक रचना




