साहित्य

वह खाली आसन

जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी

आज फिर आपकी पुण्यतिथि है, पिता!

और समय की लंबी नदी के किनारे बैठा मैं

अपनी ही परछाइयों से प्रश्न करता हूँ—

क्यों कुछ बिछोह उम्र के साथ पुराने नहीं पड़ते?

 

घर तो अब भी वही है,

दीवारें भी खड़ी हैं अपने स्थान पर,

पर एक खाली आसन ऐसा है

जिसे वर्षों बाद भी कोई भर नहीं पाया।

 

कम उम्र में आपका यूँ चले जाना

सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं था,

वह मेरे बचपन की छत का उड़ जाना था,

मेरे विश्वास की पहली दरार था।

 

लोग कहते हैं—

समय हर दुख को हल्का कर देता है।

शायद सच कहते होंगे,

पर पिता का अभाव कोई दुख नहीं,

वह तो जीवन का स्थायी मौसम है,

जो हर ऋतु में भीतर कहीं बरसता रहता है।

 

जब भी किसी बेटे को

अपने पिता का हाथ थामे देखता हूँ,

मन के किसी कोने में एक टीस चुपचाप जाग उठती है।

मैं मुस्कुरा देता हूँ बाहर से,

मगर भीतर का बच्चा

अब भी आपकी उँगली खोजता फिरता है।

 

कितनी ही बार लगा है—

अभी दरवाज़े पर कोई दस्तक होगी,

आपकी परिचित आवाज़ गूँजेगी,

और मैं वर्षों का यह विरह भूल जाऊँगा।

पर हर बार लौटकर आती है

सिर्फ खामोशी…

 

आपके जाने के बाद समझ पाया हूँ

कि पिता केवल एक संबंध नहीं होते,

वे घर की वह नींव होते हैं

जिसका महत्व तब समझ आता है

जब वह आँखों से ओझल हो जाती है।

 

आज भी जब जीवन की कठिन राहों पर

कदम डगमगाने लगते हैं,

मन अनायास आपको पुकार उठता है।

काश! एक बार फिर

आपका हाथ मेरे सिर पर ठहर जाता,

और मैं सारी दुनिया के दुःखों से निडर हो जाता।

 

पिता!

आप जहाँ भी हों,

मेरी हर सफलता में आपका आशीष है,

मेरे हर आँसू में आपकी याद है।

समय ने बहुत कुछ बदल दिया,

पर यह सत्य नहीं बदला—

 

कुछ लोग संसार से विदा होकर भी नहीं जाते,

वे धड़कनों में बस जाते हैं।

 

और आप…

आज भी मेरी हर धड़कन में जीवित हैं,

एक ऐसी कमी बनकर

जिसे कोई कभी पूरा नहीं कर सकता।

 

आपकी पुण्यतिथि पर

अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

 

~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”

युवा लेखक, कवि एवं साहित्यकार

सक्ती (छत्तीसगढ़)

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