साहित्य

नींद

सुमन बिष्ट

नींद भी रहस्यमयी रानी जैसी है,

कभी पलकों पर चुपके से उतर आती है,

और कभी यादों की चौखट पर, सारी रात दीप जलाती है।

 

जब थके हुए मन को उसकी ज़रूरत होती है,

वो रूठी प्रेमिका-सी दूर चली जाती है,

और जब हम उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं,

वो बिना शिकायत बाँहों में भर लेती है।

 

अजीब रिश्ता है इंसान और नींद का,

जिसे पाने को संसार बिछौना सजाता है,

पर वो केवल उसी के पास आती है

जिसका मन में थोड़ा संतोष भाव आ जाता है।

 

कभी अधूरी चाहतों की परछाई बनकर,

कभी बीते पलों की दस्तक बनकर,

वो रातभर पूछती रहती है,

क्या खोया क्या पाया आज तुमने दिनभर?

 

और उम्र…

उम्र तो बस करवटें बदलती रह जाती है,

नींद को न जवानी की फिक्र होती है,

न बुढ़ापे की थकान का एहसास।

वो तो बस मन की शांति की साथी है,

 

शायद इसी लिए कहते हैं,

नींद शरीर पर नहीं,विचारों से आती है,

और जिनके मन में शोर बहुत हो,

उनकी रातें अक्सर जागती रह जाती हैं।

 

स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति

सुमन बिष्ट, नोएडा

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