
वो उसके लिखे हुए ख़त, आज भी महकते हैं। सूखे हुए गुलाबों में जाने कितने सावन रहते हैं।
जब-जब खोलता हूँ उनको, वो मेरे पास चली आती है, स्याही के धुंधले अक्षरों में अपनी मुस्कान छोड़ जाती है।
कहीं शिकायत लिखी है उसने, कहीं प्यार का इज़हार लिखा, कहीं चाँद-सितारों की बातें, कहीं मिलने का त्योहार लिखा।
एक पन्ने पर उसने लिख डाला था, “तुम बिन सूना लगता जग सारा,” आज वही पंक्ति पढ़-पढ़कर मैंने जीवन काटा सारा।
काग़ज़ के वे साधारण टुकड़े, मेरे लिए अनमोल हुए, जिनमें उसके कोमल मन के सपने सारे घोल हुए।
रात ढले जब चाँद निकलता, मैं ख़त लेकर बैठ जाता हूँ, उसकी यादों की चादर ओढ़े चुपके-चुपके रो जाता हूँ।
लगता है जैसे हर अक्षर मुझसे बातें करता है, उसका भोला-सा चेहरा आँखों में फिर उतरता है।
समय बदल गया, मौसम बदले, बदल गई संसार की रीत, पर उन ख़तों में आज भी जीवित धड़कता है मेरा अतीत।
न जाने कितनी बार पढ़े हैं, फिर भी मन भरता ही नहीं, उसके लिखे हुए ख़तों से बिछड़ने को दिल करता ही नहीं।
वो दूर कहीं तारों में होगी, मैं धरती पर तन्हा हूँ, पर उसके लिखे हुए ख़तों में आज भी उसका अपना हूँ।
वो उसके लिखे हुए ख़त नहीं,
मेरी साँसों की जागीर हैं।
वो चली गई तो क्या हुआ,
उसकी यादें आज भी मेरी तक़दीर हैं।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




