
कविता के पद कम कर दिये गये
चयनित सार्थक शब्द ही लिये गये,
सारगर्भित भावना है प्रस्तुत समक्ष,
रचना धर्मिता में नहीं कोई प्रश्न यक्ष।
ऑनलाइन सब रहते हैं ज़्यादातर
यह भूल कि ऑनलाइन हैं ईश्वर,
परमात्मा वैसे ही संदेश भेजता है,
संदेश भेजता, पर नहीं दिखता है।
समझ सको तो यही समझ लो,
ऑनलाइन है नेटवर्क का मालिक,
सारा नेटवर्क त्रिलोक का चलता है,
उस एक सबके मालिक के माफ़िक़।
कर्मों की नियति व गति सब पर
सबके मालिक का है आधिपत्य,
और कोई कैसे पहुँच सकेगा या
पाएगा उसका कंप्यूटर पासवर्ड।
भक्ति और आस्था के साधन को
आदित्य पूरी लगन व तत्परता से
जीवन पुरुषार्थ साध्य बनाना है,
उसका कंप्यूटर पासवर्ड पाना है।
विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ




