
जिस परिवार में हमने अपने, सारे सुख-दुख बाँटे हैं,
खाते मिलकर भोग-मिठाई, और सभी फल बाँटे हैं।
दिल का सूना कोना अब भी, उन यादों में डूबा है,
जहाँ भाई-बहन ने रबड़-पेंसिल, भी काट कर बाँटे हैं।
कभी पड़ोसी, किराएदार भी, सब परिवार-से लगते थे,
साथ-साथ हम हँसते-गाते, लड़ते और झगड़ते थे।
पड़ोस में मुनिया की नानी, पैसे और पेड़े दे जातीं,
उसने तो वो भी आकर, हम भाई-बहन में बाँटे हैं।
जाने कब और क्यों, कैसे, रिश्तों के मायने बदल गए,
रफ्ता-रफ्ता कब हम, एक-दूजे के दिल से फिसल गए।
गली-मोहल्ले की ताई, चाची, भी माँ-सी लगती थीं,
अब तो अपने मात-पिता ही भाई-बहन ने बाँटे हैं।
छत से छत पर कूद-कूद कर, पूरा मोहल्ला नापा था,
एक-एक बंदे के नेह को, अपने हृदय में छापा था।
रूठना और मनाना, परिवार में दोनों होते थे,
अब भूल मनाना, रूठा-रूठी,ने परिवार ही बाँटे हैं।
विनीता चौरासिया शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश




