
हाथ में हाथ लिए जब चलते हैं दो लोग,
रास्ते खुद-ब-खुद मंज़िल बन जाते हैं।
सिर्फ *जवानी* ही नहीं महकती उनसे,
*बुढ़ापे* के दिन भी महफ़िल बन जाते हैं।
नए जोड़े की हँसी में जो चमक है,
वो उधार नहीं किसी चाँद-सितारे से।
और बुज़ुर्गों की छड़ी की खट-खट में भी,
एक धुन है जो निकली है प्यार के सहारे से।
*हमसफर* अगर नेक-दिल मिल जाए,
तो सफ़र आसान हो जाता है।
काँटे भी फूल लगते हैं पाँव में,
हर मौसम गुलिस्तान हो जाता है।
जवानी में जो वादे किए थे धड़कन ने,
बुढ़ापे में वही दुआ बन जाते हैं।
लाठी थामे हाथ काँपते नहीं,
क्योंकि साथ में दो हमराह चलते जाते हैं।
ना उम्र देखता है सच्चा साथ,
ना वक़्त का हिसाब रखता है।
*अच्छा हमसफर* मिल जाए तो यारो,
*बुढ़ापा भी जवानी सा लगता है।*
डॉ.अनिता निधि जमशेदपुर , झारखंड




