हर किसी के मन में
जो किसी से कह सकें
कभी सही समय नहीं मिलता
कभी सही इन्सान
कभी बातें डगमग हो जाती हैं
कभी निकल नहीं पाते लफ़्ज़।
कितनी ही बातें होती हैं
हर किसी के मन में
कोई उकेर लेता डायरी में
कोई कविता कहानी बना लेता
ज्यादातर घोल कर पी जाते
बातों को चुपचाप अकेले में।
कितनी ही बातें होती हैं
हर किसी के मन में
उबलती हुई चाय सी
जमी हुई बर्फ़ सी
सूखी हुई रोटी जैसी
ये बातें जीवन भर
शक्ल बदलती रहती हैं
इंसानों की तरह।
©संजय मृदुल



