साहित्य

लघु कथा किरदार पिता का ,,

डॉ रामशंकर चंचल

मेरी सरकारी नौकरी लगी थी एक बहुत दूर गांव में जो संवेदनशील कहां जाता था, सरकारी नौकरी कहा नसीब थी तब भी, अब तो सपना हो गया है
खैर साहब, पिता की चिंता बढ़ गई खुशी के साथ रात की नींद भी गायब थी, आखिर लखावा से पीड़ित पिता ने अद्भुत साहस दिखाया और किसी को नहीं बताया एक दिन चुप चाप बी,ओ ऑफिस में अधिकारी सैय्यद साहब के पहुंच गए, अधिकारी सैय्यद साहब ने उन्हें खिड़की से ही आते देखे लिया था, अपनी कुर्सी छोड़ कर बाहर आय और बोले साहब यह क्या किया आप क्यों आए इस हालत में, पिता जी हायर सेकेंडरी स्कूल में चर्चित सहज सरल देवत्व इंसान के रूप में चर्चित थे पूरा शहर जनता था
खैर साहब पिता ने उन्हें मेरी पीड़ा बताई थी और अधिकारी सैय्यद साहब ने उन्हें अपनी गाड़ी से घर छोड़ कर उन्हें प्रणाम किया और
ऑफिस जाते ही मेरे नाम का आदेश
एक अच्छी स्कूल में जो शहर से पास
कड़वाद का निकाल कर तुरंत चपराची के साथ पिता को और हमारे एच एम को भेजा

इधर पिता का बेटी की खुशी और सुकून के लिए बिना बोले लखावा में घर से निकल जाना यानी पूरे घर में अद्भुत चिंता बढ़ गई थी उनकी तलाश में सब निकले उसके पहले उन्हें अधिकारी सैय्यद साहब की गाड़ी से घर पर दस्तक देते हुए देखा
मां, ने अन्य सभी ने कुछ नाराजी जाहिर की जो सही थीं , सभा चाहते थे सही स्थान पर मेरा स्थानतर हो
पर पिता से बोले कोई तो साथ ले जाते अकेले क्यों गए पर वो पिता थे
जिन्हें कई दिन से रात की नींद नहीं आ रही थी , सोचा होगा किसी से क्या बोलना पता नहीं आज कल पर
टालते रहेंगे और बेटा परेशान हो जायेगा
सचमुच पिता ही है जो सदियों से धरती पर अपने घर परिवार और बच्चों की खुशी के लिए जीता हुआ
अपने जीवन के कितने ही सुख सुकून त्याग देता है पिता नहीं सच तो यही है कि यहीं ईश्वर है जो जीवन्त रूप में सदा ही बच्चों के साथ होता हैं वंदनीय हैं पिता का किरदार पिता की चिंता ख्याल जो पूजी है आजीवन प्रणाम योग्य है प्रेरणा स्रोत है

डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश

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