
वह एक टीचर ही तो थी—स्कूल की सबसे सम्मानित और शांत स्वभाव वाली महिला। काव्या अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित थी और बच्चे भी उसे बहुत पसंद करते थे। लेकिन स्कूल में एक बात उसे अंदर ही अंदर परेशान कर रही थी।
राहुल सर का व्यवहार उसके प्रति हमेशा थोड़ा अलग रहता था। वे अक्सर उसे नज़रअंदाज़ कर देते थे, कभी बिना वजह बातों को टाल देते, और कई बार ऐसा लगता जैसे वे उसके काम को ठीक से स्वीकार ही नहीं करते। यह सब बात काव्या के मन में धीरे-धीरे एक असहजता बनकर बैठ गई थी।
एक दिन काव्या अपनी कक्षा खत्म करके सीधे प्रिंसिपल के कमरे में गई। चेहरे पर हल्की गंभीरता थी, लेकिन आवाज़ में संयम था। वह बोली,
“सर, बाकी सभी का व्यवहार मेरे साथ अच्छा है, लेकिन राहुल सर मुझे देखकर कुछ अजीब सा व्यवहार करते हैं। मुझे यह ठीक नहीं लगता।”
प्रिंसिपल ने ध्यान से उसकी बात सुनी और कुछ देर सोचकर बोले,
“काव्या, आप निश्चिंत रहिए। हम इस बात को समझेंगे और सही तरीके से हल करेंगे। हर कर्मचारी के लिए सम्मान और सुरक्षित माहौल जरूरी है।”
काव्या चुप हो गई, लेकिन उसके चेहरे पर थोड़ी राहत थी। उसे लगा कि उसकी बात सुनी गई है।
कुछ दिनों बाद स्कूल में माहौल सामान्य होने लगा। राहुल सर के व्यवहार में भी धीरे-धीरे बदलाव दिखने लगा। अब बातचीत में औपचारिकता के साथ सम्मान भी जुड़ गया था।
काव्या ने समझ लिया कि हर समस्या का हल चुप रहकर सहने में नहीं, बल्कि सही जगह सही तरीके से अपनी बात रखने में होता है।
और सबसे जरूरी बात—हर इंसान, चाहे वह पुरुष हो या महिला, सम्मान का हकदार होता है।
सपना कुमारी, कोल्हापुर




