साहित्य

लघु कथा  पहले तुम, फिर मैं 

डॉ रामशंकर चंचल 

आज बस अचाचक याद आ गया, तुम्हारे प्यार का यह बेहद सुकून देता अहसास जो, जीवन में पहली बार महसूस किया था

हम तुम, कुछ दो खास परिवार के साथ एक दिन का सफ़र धूमने गए थे, धूम फिर, किसी होटल में दस्तक दे खाना खा रहे थे, सभी ने अपनी अपनी थाली में खाना टेबल पर रखा ले लिया था, में खाने की टेबल से दूर बैठा था, वैसे भी में दुनियां के लोगों से बहुत डरता हूं, चुप रहता हूं मिलता ही नहीं, केवल तुम्हारे सिवा

जानता हूं ने तुम दुनिया नहीं हो, तुम भी दुनियां की भीड़ से अलग, अपने मैं मस्त और व्यस्त हो मेरी तरह

खैर साहब सभी ने अपना खाना ले लिया, देखा तुमने नहीं लिया था, सभी साथ वाले अपनों ने खाना ले लिया तो तुम बेबाक बोली मुझे से, लाओ अपनी थाली मुझे दो, में चुप चाप अपनी थाली आगे बढ़ा दी तुम ने मेरी थाली में खाना रखा फिर थाली मेरे आगे बढ़ा कर, तुमने अपनी थाली में खाना रखा, ऐसा जीवन में पहली बार देखा कि किसी को मेरे यहां भी चिंता, पहले आप फिर में यहीं हैं प्यार की असली परिभाषा जानता था, सोचा नहीं था मुझे यह नसीब होगा, पर आज देख जिंदगी सुख सुकून से भर गई, सच तो यह कि भूख ही खत्म हो गई, बस प्यार का यह अहसास याद कर जब आज अद्भुत सुकून महसूस कर रहा हूं तो उस समय की बात ही अलग है, तुम्हारा मेरे प्रति बेबाक अपनापन और प्यार देख कुछ साथ के चौक रहे थे पर देखा उसमें एक जो तुम्हारी जिंदगी है वह अच्छा महसूस कर रही थी यह देख मुझे बहुत सुकून मिला कि कोई एक ही सही जो हमारे साथ है

खैर आज यह अद्भुत सुकून आज भी मुझे जिंदा रखे है कोई एक ही सही है तो सही दुनिया में पास नहीं तो दूर ही सही कोई होता दिल का अपना, गीत याद आ गया और सुखद महसूस करते हुए नींद आ गई,,,

 

 

 

डॉ रामशंकर चंचल ×

झाबुआ मध्य प्रदेश

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