
लोकमान्य तिलक, राष्ट्र-ज्योति, जन-मन के थे प्राण।
स्वाधीनता का मंत्र दिया, बढ़ा दिया सम्मान॥
“स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार” अमर उद्घोष,
जाग उठा भारत सकल, टूटा भय का कोष॥
लेखनी बनी वज्र-सी, अन्यायों पर वार,
‘केसरी’ की गर्जन से काँपा अत्याचार॥
गणपति उत्सव, शिवाजी का गौरव दिया जगाय,
जन-जन में राष्ट्रप्रेम की पावन ज्योति जलाय॥
कारागार की वेदना भी जिनको रोक न पाई,
कर्मपथ के उस तपस्वी ने विजय-पताका फहराई॥
ज्ञान, त्याग, संघर्ष का अनुपम था अभियान,
भारत माता के लिए अर्पित किया जीवन-दान॥
मुखमंडल पर तेज था, अद्भुत दिव्य प्रकाश,
श्वेत मूँछ, टोपी, चादर में झलके राष्ट्र-विलास॥
दृढ़ नयनों में जल रहा स्वाधीनता का मान,
लोकमान्य तिलक बने भारत की पहचान॥
ऐसे अमर पुरुष को शत-शत मेरा प्रणाम,
युग-युग तक गूँजे धरा पर उनका पावन नाम॥
तिलक-जयंती पर करें हम यह पावन संकल्प,
राष्ट्रधर्म हित कर्म करें, यही सच्चा विकल्प॥
स्वरचित
डॉ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




