साहित्य

दीवानी

डो.दक्षा जोशी '

प्रेम-दीवानी मीरा ,गिरिधर गोदी तज,

सजनी यह कैसी अलख जगाए चली?

लोक-लाज के सारे बंधन आज तोड़े,

हरि-मिलन की आस हृदय लगाए चली।

पथरीली राहें भी रोककर खड़ी हैं,

राणा के पहरे विष के प्याले,

पर रोक न पाया कोई इसे देखो,

ये तो चली री श्याम के द्वारे।

पहाड़ों से गिरकर जो आज छलकती,

वो जल नहीं मीरा के नैना हैं,

पिया बिन व्याकुल रैन-दिन जागे सदा,

इसे पल भर भी आता चैना नहीं।

बहना ही इसकी प्रीत की रीत,

खोना ही तो इसका सच्चा पाना है,

जब मिल जाएगी सागर-स्याम में जाकर,

तभी तो सफल यह जीवन जाना है।

विरह की अग्नि में जलती हुई,

मीरा अब तो बस चली श्याम-द्वार।

 

-डो.दक्षा जोशी ‘निर्झरा’

अहमदाबाद, गुजरात।

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