
प्रेम-दीवानी मीरा ,गिरिधर गोदी तज,
सजनी यह कैसी अलख जगाए चली?
लोक-लाज के सारे बंधन आज तोड़े,
हरि-मिलन की आस हृदय लगाए चली।
पथरीली राहें भी रोककर खड़ी हैं,
राणा के पहरे विष के प्याले,
पर रोक न पाया कोई इसे देखो,
ये तो चली री श्याम के द्वारे।
पहाड़ों से गिरकर जो आज छलकती,
वो जल नहीं मीरा के नैना हैं,
पिया बिन व्याकुल रैन-दिन जागे सदा,
इसे पल भर भी आता चैना नहीं।
बहना ही इसकी प्रीत की रीत,
खोना ही तो इसका सच्चा पाना है,
जब मिल जाएगी सागर-स्याम में जाकर,
तभी तो सफल यह जीवन जाना है।
विरह की अग्नि में जलती हुई,
मीरा अब तो बस चली श्याम-द्वार।
-डो.दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




