
त्थर पारस ढूंढ रहा इंसान आज,
भूल गया खु़द का असली मिज़ाज
लोहे जैसा सख़्त हुआ दिल सबका,
खोया नूर वो पावन सच्चा रबका।
बाहर चमक ढूंढती फिरती अंधी दुनियां,
भीतर सिमटी बैठी रोती सच्ची खु़शियां।
छूकर देखो तुम कभी दर्द किसीका,
शायद बदल जाए फ़िर ढंग ज़िंदगी का।
सच्ची हमदर्दी ही असली पारस होती,
वरना दुनिया केवल झूठे आंसू रोती।
रिश्तों की ज़मीं सूखी बंजर भाई,
अपनों में ही दिखती गहरी खाई।
सोना बनकर क्या पाओगे जग में,
कांटे बिखरे पड़े आज हर पगमें।
अंतस जगाएं हम तो बात बने,
तभी जीवन के सुंदर ख़्वाब सजे।
दुआओं का स्पर्श ही सच्चा जादू,
रख पाए जो मन पर काबू।
ढूंढना बंद करें हम बाहर पारस,
भीतर जगाएं प्रेम रस का सारस।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।



