साहित्य

मेजा में ट्रिपल हत्या

जयचन्द प्रजापति

की आग में तुम

तड़प-तड़प कर

 

आखिर ले ली

तीन जिंदगियां

 

कौन सी इमारत खड़ी कर ली

कौन सा प्रेम का पन्ना लिख दिया

 

कहर बनकर

प्रयागराज के मेजा में

 

अंधेरी रात में

नामर्दगी की किताब लिखकर

 

हंसते परिवार में

गहरा जख्म दिया है

कभी न भरने वाला जख्म

 

बहुत बड़ी नादानी हुई है

कितना तड़पा कर मारा होगा

 

हाय रे सिरफिरे !

जिसको रसातल में भेजा

तू खुद रसातल में

अपनी कब्र खोद ली है

 

—-

जयचन्द प्रजापति ‘जय’

प्रयागराज

 

कविता का भावार्थ– प्रेम के जुनून में अंधा होकर एक युवक ने प्रयागराज के मेजा में प्रेमिका के घर के तीन सदस्य मार डाले; इस उन्मत्त कृत्य ने हँसते-खिलखिलाते एक परिवार को अकस्मात अँधेरी तबाही में बदल दिया और न केवल उन जानों को छीन लिया बल्कि घोर कायरता और नादानी की एक ऐसी छाप छोड़ी जो कभी भर न सकेगी — जिसने जो किया, उसने दूसरों को रसातल में धकेलकर स्वयं भी अपनी कब्र खोद ली।

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