साहित्य

अगर शब्दों को आँसू आते

शशि कांत श्रीवास्तव 

अगर शब्दों को आँसू आते -तो…!

हर अधूरी कहानी भीग जाती,

जो बातें हम कह नहीं सकते,

वो कागज़ पर उतरकर सिसकियाँ बन जाती हैं,

और किताबों के पन्ने नम दिखाई देते हैं,

और कविता किसी टूटे हुए दिल की धड़कन बन जाती है,

जो कहते हैं कि, मैं ठीक हूँ …,

उनके ही शब्द सबसे ज़्यादा भीगे होते हैं,

किसी की याद…,या किसी का बिछड़ना,

हर उस एहसास की नमी शब्दों में दिख जाती है,

क्योंकि…..!

दर्द आवाज़ नहीं करते,

वो टूटा करते हैं.. चुपचाप,

अगर शब्दों को आँसू आते -तो…|

माँ की दुआओँ में छिपी चिंता दिख जाती,

पिता की डाँट में दबा प्रेम बह निकलता,

तब शायद लोग समझ पाते,

कि शब्द केवल अक्षर नहीं होते,

वे इंसान के मन का आईना होते हैं,

तभी तो कुछ शब्द मरहम बन जाते हैं,

तो कुछ उम्रभर का घाव दे जाते हैं,

अगर शब्दों को आँसू आते -तो…|

शायद कई रिश्ते टूटने से बच जाते,

यह तो अच्छा है -कि,

शब्द रोते नहीं,बस वे हमें रुला जाते हैं ||

 

शशि कांत श्रीवास्तव

डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

स्वरचित मौलिक रचना

 

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