
*अंतरराष्ट्रीय योग दिवस और योग का महत्व*र्वे भवन्तु सुखिन:,
सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पष्यन्ति,
मा कश्चिद दुख भागभवेत।
सभी सुखी रहें। महर्षि पतंजलि का योग सूत्र “सहनाववतु, सहनी भुनन्तु, सहवीयंकरवावहै तेजस्विना वधीतमस्तु, माविद्व्षावहै” के अनुसार योग जोड़ने की प्रक्रिया है, जोड़ने की कला है, जोड़ने का शास्त्र है और जोड़ने का विज्ञान है।अध्यात्म योग, कर्म योग और राज योग इस योग शास्त्र की विधाएँ हैं। योग मन, शरीर और आत्मा की एकता को सक्षम बनाता है। योग के विभिन्न रूपों से हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अलग अलग तरीकों से लाभ मिलता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस इस अनूठी कला का आनंद लेने के लिए मनाया जाता है। माना जाता है कि भारतीय पौराणिक युग से योग की जड़ें जुड़ी हुई हैं। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव ने इस कला का आविष्कार किया था। शिव, जिन्हें आदि योगी के रूप में माना जाता है, उन्हें ही संसार के सभी योग गुरुओं के लिए प्रेरणास्रोत माना जाता है।
सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि यह उत्तर भारत में सिंधु-सरस्वती सभ्यता जिसने 5000 साल पहले इस शानदार कला की शुरुआत की थी। ऋग्वेद में पहली बार इस अवधि का उल्लेख किया गया है। हालाकि योग की पहली व्यवस्थित प्रस्तुति शास्त्रीय काल में ऋषि पतंजलि द्वारा की गई थी।
21 जून को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस इस प्राचीन भारतीय कला के लिए एक अनुष्ठान है। हमारे दैनिक जीवन में योग को अपनाने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है। यह हमारे तनावपूर्ण जीवन के लिए बड़ी राहत प्रदान करता है। विश्व योग दिवस पर हम जो योग कर रहे हैं, आसन, प्राणायाम और व्यायाम; इसके इतर भी योग कर्म हैं। एक किसान बैलों के साथ हल जोत कर जो कर्म कर रहा है, वह भी तो एक योग है, एक मजदूर और राजगीर ईंट पत्थर जोड़कर दीवाल खड़ी करते हैं, क्या यह योग नहीं है?, क्या एक कुंभकार मिट्टी पानी मिलाकर चाक के साथ जो कर्म कर रहा है, वह योग नहीं?, मजदूर और कर्मचारी एक दूसरे के साथ मिलकर जो उत्पादन करते हैं वह योग नहीं है? मेरा मानना है कि यही कर्म योग है।
ऋषि-मुनि तपस्या व साधना करके भगवत प्राप्ति की अपेक्षा करते हैं वह अध्यात्म योग है। शारीरिक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए प्राणायाम, व्यायाम और आसन करना राज योग है। तो सोचिए कि दुनिया में कौन योग नहीं कर रहा है?
धर्म, जाति, वर्ण, समुदाय व देश, समाज के नाम पर योग विद्या में भेद करना योग नहीं है। योग किसी धर्म, जाति, समाज या देश की संपत्ति नहीं है। यदि विश्व ने योग को अपनाया है तो किसी धर्म या देश का एकाधिकार मानकर नहीं, ग्राह्यता के आधार पर इसे मनाया जाना चाहिये।जहाँ तक कुछ लोगों के इस आयोजन में शामिल न होने को लेकर सवाल खड़ा किया जाय तो वह योग नहीं वियोग है।
योग में + (प्लस) होता है, – (माइनस) नहीं। किसी को इस कार्यक्रम में शामिल न होने के लिए बुरा भला कहा जाता है तो योग को महत्व नहीं दिया जा रहा है बल्कि यह तो विशुद्ध वियोग है।
योगेश्वर श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘एकोहम द्वतीयोनास्ति’, अर्थात् सब तो उसी में निहित है, फिर किसी के कर्म को उसके अनुसार करने या न करने को योग से विरत कैसे कहा जा सकता है।
हमारे हिंदू धर्म के बारे मैं तमाम बातें की जा रही हैं, क्या हिंदू धर्म सबको आत्मसात करने की सामर्थ्य नहीं रखता है ? या यह कहना कि जिसने योग कार्यक्रम में भाग नहीं लिया वह हिन्दू नहीं है, वह भारतीय नहीं है! हमारे धर्म में ऐसी संकीर्णता कभी नहीं थी। योग अंग मर्दन की क्रिया न होकर, योग शरीर, मन और आत्मा को एक करने की विद्या है, योग एक को दूसरे से, आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की साधना है फिर इस मूल मंत्र को नकार कर योग साधना की महिमा और महत्व को कम नहीं करना चाहिये। किसी की बुराई या निंदा करना, योगिक क्रिया नहीं है, उसको जोड़ने का काम योग है, न कि उसे अपने से दूर करना योग है।
सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, निरामय हों, यही महर्षि पतंजलि के योग शास्त्र का मूल मंत्र है। *योगक्षेम्यमवहाम्यम।*
डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ



