
डायरी के कुछ पन्ने, आज अचानक खुल गए। बीते वर्षों की मधुर स्मृतियाँ, शब्दों में फिर घुल गए।
एक पन्ने पर लिखा हुआ था— “आज घर में खुशियाँ आईं, नन्ही बिटिया के आगमन से आँगन में किलकारी छाई।”
दूजे पन्ने में दर्ज था— “पहला अक्षर पढ़ने आई, ज्ञान की राह पकड़ मेरी बेटी, जीवन में आगे बढ़ती जाए।”
फिर लिखा था— “मेहनत से उसने पढ़ाई की, हर परीक्षा में नाम कमाया,
उसकी छोटी-छोटी सफलताओं ने मेरा मस्तक ऊँचा कराया।”
आगे के पन्नों में चमक रहा था— “अपने पैरों पर खड़ी हुई, कैरियर में पहचान बनाई,उसकी लगन और कर्मठता ने हर मुश्किल राह सजाई।”
एक सुनहरा पृष्ठ कहता था— “आज विदा होकर ससुराल गई, आँखें नम थीं, मन मुस्काया,
जिस बेटी को उँगली पकड़ चलाया, उसने जीवन का मान बढ़ाया।”
अंतिम पन्नों में लिखा मिला— “ससुराल में आदर पाती है, सबके दिल की शान बनी है,
मेरी बेटी की उपलब्धियों से जीवन मेरी धनवान बनी है।”
पिता की डायरी के ये पन्ने, प्रेम और गर्व की गाथा हैं,
संतान की खुशियों में ही बसती, माता-पिता की परिभाषा है।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा’ सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार



