साहित्य

घमंड का आईना

सपना कुमारी,

मां, मैं बहुत खूबसूरत हूं, इसलिए गौरव ने मुझे चुना। आपकी इतनी हैसियत नहीं थी कि आप मेरे लिए सरकारी दामाद ढूंढ़ पाते।”

वैष्णवी के मुंह से निकले ये शब्द उसकी मां के दिल में तीर की तरह चुभ गए। आंखों में आंसू आ गए, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

वैष्णवी यहीं नहीं रुकी।

“पिताजी, आपको तो रहने के लिए ढंग की छत भी नसीब नहीं थी। आपने मेरे लिए किया ही क्या है?”

पिता चुपचाप सिर झुकाकर खड़े रहे। जिस बेटी की हर खुशी के लिए उन्होंने अपनी जरूरतों का गला घोंटा था, आज वही उनकी गरीबी का मजाक उड़ा रही थी।

मां ने धीरे से एक थैला आगे बढ़ाया।

“बेटा, तेरे लिए एक कुर्ती और चप्पल लाई थी। बहुत महंगी तो नहीं है, लेकिन प्यार से खरीदी है।”

वैष्णवी जोर से हंस पड़ी।

“मां, मैं पंद्रह सौ रुपये की सैंडल पहनती हूं। ये सौ रुपये वाली चप्पल किसी भिखारी को दे देना। और अगली बार यहां आओ तो थोड़ा ढंग से आया करो। अब मैं अमीर घर की बहू हूं।”

पास में रहने वाली पड़ोसन शारदा जी यह सब सुन रही थीं। उनका मन दुखी हो गया।

उन्होंने कहा, “बेटी, सुंदरता और पैसा दोनों हमेशा नहीं रहते। इंसान को अपने संस्कारों पर घमंड करना चाहिए।”

लेकिन वैष्णवी ने उनकी बात को हंसी में उड़ा दिया।

समय बीतता गया।

कुछ सालों बाद गौरव को नौकरी में बड़ा प्रमोशन मिला। नई गाड़ी, बड़ा घर और बैंक बैलेंस देखकर वैष्णवी का घमंड और बढ़ गया। उसे लगने लगा कि दुनिया में उससे ज्यादा खुश कोई नहीं है।

लेकिन जिंदगी हमेशा इंसान के हिसाब से नहीं चलती।

एक दिन गौरव की तबीयत बिगड़ने लगी। कई जांचों के बाद डॉक्टरों ने बताया कि उसे कैंसर है।

यह सुनकर पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

इलाज शुरू हुआ। कीमोथेरेपी के कारण गौरव के घने बाल झड़ गए। चेहरा काला पड़ने लगा। शरीर कमजोर हो गया। जो व्यक्ति कभी बेहद आकर्षक और आत्मविश्वासी दिखाई देता था, अब पहचान में भी मुश्किल से आता था।

वैष्णवी अस्पताल के गलियारों में बैठकर घंटों रोती रहती।

उसे याद आने लगा कि कभी वह अपनी सुंदरता पर कितना घमंड करती थी। वह दूसरों को उनकी हैसियत और रूप देखकर आंकती थी।

एक दिन अस्पताल में बैठी हुई उसने देखा कि उसकी मां गौरव के लिए घर का बना खाना लेकर आई हैं और पिता दवाइयों का बिल भरने के लिए अपनी बचत तक निकाल लाए हैं।

वैष्णवी की आंखें भर आईं।

उसने मां का हाथ पकड़ लिया।

“मां, मैंने आपको बहुत दुख दिया था। मैं खुद को सुंदर और अमीर समझकर अंधी हो गई थी।”

मां ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेर दिया।

“बेटी, जीवन में सब कुछ बदल जाता है। रूप बदलता है, पैसा बदलता है, हालात बदलते हैं। लेकिन अपने कभी नहीं बदलते।”

कई महीनों तक इलाज चला। धीरे-धीरे गौरव की हालत सुधरने लगी। डॉक्टरों की मेहनत, दवाइयों और परिवार के प्यार ने असर दिखाया। वह कैंसर से लड़कर वापस सामान्य जीवन की ओर लौटने लगा।

हालांकि इलाज के कारण उसका चेहरा पहले जैसा नहीं रहा था। बाल भी कम थे और शरीर पहले जितना आकर्षक नहीं दिखता था।

एक दिन आईने के सामने खड़े गौरव को देखकर वैष्णवी मुस्कुराई और बोली,

“पहले मैं तुम्हारे चेहरे से प्यार करती थी, आज तुम्हारी हिम्मत से करती हूं।”

गौरव की आंखें नम हो गईं।

उसी पल वैष्णवी को अपनी सबसे बड़ी सीख मिल चुकी थी।

जिस सुंदरता पर उसे कभी घमंड था, वह कुछ सालों में बदल सकती थी। जिस पैसे पर उसे नाज था, वह इलाज में खर्च हो सकता था। लेकिन मां-बाप का प्यार, उनके संस्कार और अपनों का साथ ही असली दौलत थी।

उस दिन के बाद वैष्णवी ने कभी किसी की गरीबी, कपड़ों या रूप का मजाक नहीं उड़ाया।

क्योंकि अब उसे समझ आ चुका था कि जीवन का सबसे बड़ा आईना चेहरा नहीं, बल्कि इंसान का चरित्र होता है।

— सपना कुमारी,  कोल्हापुर

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