
और योगासन को, यह जग सारा भूला है,
आधुनिकता के झूले में, झूल- झूल कर फूला है।
पहले कपड़े धोए जाते, कूट-कूटकर हाथों से,
तब श्रम ही योग बना करता था,घर-आँगन के कामों से।
घर के सारे मसाले भी, ओखल में कूटे जाते थे,
हाथ की चक्की से हम गेहूँ, पीस-पीसकर खाते थे।
तब पेटों की कसरत होती, जब घर की चक्की चलती थी,
हाथों की चर्बी घटती थी, ओखल में मूसल चलती थी।
झाड़ू-पोंछा, चौका-बासन, सबमें श्रम का योग था,
तन को स्वस्थ बनाए रखने का,घर-घर में संयोग था।
आज मशीनों ने छीना है, श्रम का सच्चा अनुपम मान,
बैठे-बैठे थक जाता है,अब तो मानव का अवसान।
आज बाज़ार की चक्की के, आटे-मसाले खाते हैं,
झूठ-मूठ की चक्की चलाने, योग-कक्षा में जाते हैं।
जिन कामों में योग छिपा था, उनको हमने त्याग दिया,
और कृत्रिम आसनों में ही स्वास्थ्य-सुख का राग लिया।
संकल्प करें हम फिर से योग का, निज जीवन में उतारें हम,
श्रम, संयम, प्राणायाम से तन-मन स्वस्थ सँवारें हम।
विनीता चौरासिया
शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश


