साहित्य

योग और योगासन

विनीता चौरासिया

और योगासन को, यह जग सारा भूला है,

आधुनिकता के झूले में, झूल- झूल कर फूला है।

 

पहले कपड़े धोए जाते, कूट-कूटकर हाथों से,

तब श्रम ही योग बना करता था,घर-आँगन के कामों से।

 

घर के सारे मसाले भी, ओखल में कूटे जाते थे,

हाथ की चक्की से हम गेहूँ, पीस-पीसकर खाते थे।

 

तब पेटों की कसरत होती, जब घर की चक्की चलती थी,

हाथों की चर्बी घटती थी, ओखल में मूसल चलती थी।

 

झाड़ू-पोंछा, चौका-बासन, सबमें श्रम का योग था,

तन को स्वस्थ बनाए रखने का,घर-घर में संयोग था।

 

आज मशीनों ने छीना है, श्रम का सच्चा अनुपम मान,

बैठे-बैठे थक जाता है,अब तो मानव का अवसान।

 

आज बाज़ार की चक्की के, आटे-मसाले खाते हैं,

झूठ-मूठ की चक्की चलाने, योग-कक्षा में जाते हैं।

 

जिन कामों में योग छिपा था, उनको हमने त्याग दिया,

और कृत्रिम आसनों में ही स्वास्थ्य-सुख का राग लिया।

 

संकल्प करें हम फिर से योग का, निज जीवन में उतारें हम,

श्रम, संयम, प्राणायाम से तन-मन स्वस्थ सँवारें हम।

 

विनीता चौरासिया

शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश

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