
सुनो, सुनो जन-गण का गुंजन,
फहराता तिरंगा, गगन-चुंबन।
घड़ी की टिक-टिक बोल उठी,
गणतंत्र की गाथा फिर दोहराई।
नया सवेरा, नया अरुण-उजास,
संविधान की मंगल-पयास।
स्वतंत्र गगन में पंख फैलाकर,
नई उड़ानों को दे रहा अवसर।
“समता, स्वतंत्रता, बंधुता का स्वर”,
हर दिल में गूँजा अमर संविधान-सार।
जन-जन की आशा, जन-जन का गान,
लोकतंत्र का यह महान अभियान।
चलो फिर से शपथ लें हम सब मिलकर,
रखें इस धरोहर की लाज सँभालकर।
निडर, निर्भय, निष्कंटक राह पर,
बढ़ते चलें हम गणतंत्र के पथ पर।
जय हिंद, जय भारत,
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ।
डॉ सुरेश जांगडा
राजकीय महाविद्यालय सांपला, रोहतक (हरियाणा)



