
1.)सामुहिक रुप से योगाभ्यास एक छलावा है। भीड़-भाड़ एकत्र करके कुछ शारीरिक व्यायाम करवाना किसी भी दृष्टिकोण से योगाभ्यास नहीं है।वार्म अप, सुक्ष्म क्रियाएं, हल्के व्यायाम या फिर सूक्ष्म व्यायाम शारीरिक निरोगता के लिये लाभकारी होते हैं, लेकिन इसे योगाभ्यास नहीं कहा जा सकता है। वैसे तो देश विदेश में वर्ष भर योग शिविर,योग कक्षाएं, योगाभ्यास कक्षाएं या ध्यान शिविर वगैरह चलते रहते हैं लेकिन 21 जून के आसपास इसका जुनून विशेष रूप से देखने को मिलता है।जिसे देखो वही मैट या चद्दर या योग साधक की चदरिया ओढ़े दिखाई पड़ता है।पार्क,उद्यान,हाल,योग संस्थान,झील, तालाब आदि के आसपास लोगों की भीड़-भाड़ योगाभ्यास की आड़ में शारीरिक तोड़-मरोड़ करती देखी जा सकती है। लेकिन यह सब करना योगाभ्यास नहीं है।मोटे पेट, थुलथुल पेट,भारी भरकम कमर, चलने में अशक्त, पेंट शर्ट बैल्ट धारण किये,जीभ के गुलाम, अनुशासनहीन,क्रोध की साक्षात् मूर्ति, मांस -मीट- अंडाभक्षी, जींसधारी, शराबी,शबाबी आदि सभी योगाभ्यास के लाभ गिनवाते हुये या योगाभ्यास की आड़ में हल्की कसरतें करते हुये देखे जा सकते हैं।
2.) योगाभ्यास भारतवर्ष की पुरातन सनातन वैदिक विद्या है।यह एक अनुशासन है।यह किसी शास्त्र को रटना न होकर शुद्ध रूप से संयम है।यह योग संबंथी पुस्तकों, ग्रंथों और योगियों की जीवनियों का अध्ययन मात्र न करके एक प्रायोगिक चेतना का विज्ञान है।यह केवल कोई सिद्धांत,वाद,मत, विचार आदि न होकर एक साधना द्वारा अनुभूति का शास्त्र है।यह जीवन जीने की कला है।यह जीवन का विज्ञान है।यह चेतना का विज्ञान है।यह केवल परीक्षा का विषय न होकर दीक्षा, साधना और स्वानुभूति है।यह निज स्वरूप में ठहलना है।यह होश, जागरण, सजगता और विवेक का तप है।यह निर्विचार चेतना में होना है।यह विचारों पर नियंत्रण है।यह स्वयं के चित्त को मल ,विकार और अशुद्धियों से खाली करके स्वयं की चेतना को पारदर्शी बनाना है।योग कोई दिखावा नहीं अपितु दिखावा करने वाले मन को समझना है।योग केवल शुष्क तर्क – वितर्क न होकर तर्कातीत की यात्रा है। इसमें तर्क- वितर्क का भी सम्मान है लेकिन वहां से आगे जाना भी है।योग संसार विरोध नहीं अपितु संसार रहते हुये भी निर्विकार,निश्छल और निस्पंद होना है।योग अपनी सोई शक्तियों का जागरण करके उनका सृजनात्मक उपयोग है।योग विभूतियों और सिद्धियों का प्रदाता है लेकिन इन्हीं में फंसकर नहीं रह जाना है।
योग ‘स्व’ और ‘पर’ में सामंजस्य है।योग संसार और अध्यात्म में समन्वय है।योग इहलोक और परलोक में मैत्री है।योग संयोग और वियोग में समरसता है।योग चित्त वृत्तियों को समझकर उन पर नियंत्रण है।योग चित्त की वृत्तियों का प्रबोध है।योग चित्तवृत्तिनिरोध और चित्तवृत्तिप्रबोध में रहते हुये निष्कंप चेतना में होना है।योग वर्तमान में होना है। बाहरी सभी पहचान से आगे बढ़कर स्वयं को जानना योग है।परिधि और केंद्र, बाहर और भीतर,तुम और मैं – इनमें एकसूत्रता समझकर अद्वैतानुभूति योग है।एक व्यक्ति के अस्तित्व के जितने भी स्तर हैं,उन सबको शुद्ध करते हुये परम चेतना में होना योग है।समाज, व्यक्ति,शरीर,श्रास- प्रश्वास,प्राण, विचार, भावना आदि से होशपूर्ण जुड़ाव रखते हुये अस्तित्व से जुड़ाव करना योग है।जीवन में मौजूद टूटन,बिखराव,अकेलेपन को जानकर अपने मूल स्थान का साक्षात्कार योग है। उपरोक्त दी गई परिभाषाओं में शारीरिक तोड़-मरोड़ को किसी ने योग की संज्ञा नहीं दी है। व्यायाम या सूक्ष्म क्रियाओं को किसी ने भी योग नहीं कहा है।दिखावे को किसी ने योग नहीं कहा है।केवल मैट,लोवर,ढीले वस्त्र और योग साधक या योग शिक्षक लिखी गई बनियान पहनने को किसी ने भी योग नहीं कहा है। भीड़-भाड़ में जाकर गप्पें मारने को किसी ने योग नहीं कहा है। किसी योगी का अंधभक्त बनने को भी किसी न योग नहीं कहा है।
3.)भारत और भारत से बाहर जितना भी योग -केंद्रों का पंजीकरण बढता जा रहा है, उतना ही योग की आड़ में पाखंड, ढोंग, दिखावा, शोषण और दुकानदारी बढते जा रहे हैं। भारत में योग और योगाभ्यास की आड़ में राजनीति भी खूब की जा रही है।एक प्रसिद्ध व्यापारी बाबा ने तो एक पार्टी विशेष को सत्ता में लाने के लिये अपने अंधभक्त अनुयायियों को उस पार्टी के समर्थन में करोड़ों की संख्या में वोट डालने के लिये विवश किया था। पैंतीस रुपये प्रति लीटर पैट्रोल और डीजल,सस्ती रसोई गैस , विदेशी बैंकों से लाखों करोड़ का काला धन वापसी, राष्ट्रवाद की स्थापना,भारत को विश्वगुरु बनाने , शिक्षा के स्वदेशीकरण आदि के बड़े,-बड़े महाझूठ बोलने का घृणित कुकृत्य एक योगी कहलाने वाला व्यक्ति कैसे कर सकता है? लेकिन भारत में हमने यह सब होते हुये भी देख लिया है। ध्यान रहे कि यह न तो योग है,न भोग है,न संयोग है,न उद्योग (सद्कर्म) है, अपितु यह हमारे भारत के लिये कैंसर,तपेदिक और कोरोना से भी खतरनाक महारोग है। अपने व्यापारिक हित साधने के लिये ऐसे नकली और ढोंगी योगियों ने इस देश को खूब मूर्ख बनाया हुआ है। इनसे सावधान रहने की आवश्यकता है।इनकी पहुंच हमारे राजनीतिक, प्रशासनिक,विधिक सिस्टम में बहुत ऊपर तक है।
4.)योग और योगाभ्यास के सूत्र सर्वप्रथम वेदों में मौजूद हैं। वहीं से प्रेरणा पाकर ऋषियों ने योग संबंधित शास्त्रों की रचना समय -समय पर की है।दो सो से अधिक उपनिषद् योग, योगाभ्यास, साधना और अध्यात्म के ही पुराने साक्ष्य हैं।कुछ उपनिषद् तो दस हजार – बीस हजार वर्षों से भी अधिक पुराने हैं। औपनिवेशिक सोच के कारण इनको नया सिद्ध किया जा रहा हो,यह उनका सनातन धर्म और संस्कृति के प्रति द्वेषभाव है। पिछले साढ़े पांच हजार वर्षों के दौरान योग संबंधित अनेक ग्रंथ लिखे गये थे लेकिन यवन, ईसाई और इस्लामी हमलावरों के हमलों में काफी ग्रंथ नष्ट कर दिये गये। महर्षि पतंजलि रचित ‘योगसूत्र’ फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ मौजूद है। इसमें 195 सूत्र और चार पाद मौजूद हैं।इसी ग्रंथ के अनुकरण पर विभिन्न धाराओं के योगियों यथा श्रमण, स्वामी,संन्यासी, भिक्षु, मुनि और योग- साधक आदि ने अपने -अपने मतों में योगाभ्यास की विभिन्न विधियों को विकसित किया। सबका मूल महर्षि पतंजलि के ग्रंथ ‘योगसूत्र’ में मिल जायेगा।इसी का अनुकरण और अनुसरण करते हुये अष्टांगयोग,सप्तांगयोग,षडंगयोग,
राजयोग,हठयोग,प्राणयोग,जपयोग,मंत्रयोग, कुंडलिनी योग, कर्मयोग,भक्तियोग,ज्ञानयोग,तंत्रयोग,ध्यानयोग,सहजयोग,सूरतशब्दयोग आदि सैकड़ों प्रकार के योग -मतों का प्रचलन हुआ है।
5.)योगसूत्र के प्रथम तीन सूत्र बड़े महत्व के हैं। बाकी योगसूत्र में इन तीन सूत्रों का विस्तृत व्याख्यान मात्र है।प्रथम सूत्र में योग को अनुशासन कहा गया है। अनुशासन के सिवाय योग कुछ नहीं है।योग की शुरुआत,योग का पथ,योग की उपलब्धि और योग उसके पश्चात् का जीवन -इन सभी स्तरों पर अनुशासन ही प्रधान है। यदि अनुशासन नहीं तो योग नहीं। बिना अनुशासन के योग एक भ्रम है।जो लोग अपनी दिनचर्या, जीवनचर्या,आहार -विहार, खान-पान, निद्रा और जागरण तथा योगाभ्यास में अनुशासन का पालन नहीं करते,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं रख सकते हैं।योग के प्रथम तीन सूत्र इस प्रकार से हैं –
अथ योगानुशासनम्।।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।।
तदा द्रष्टु स्वरूप अवस्थानम्।।(योगसूत्र, समाधिपाद,1-3)
इनका अर्थ है कि अब योग के अनुशासन को बतलाया जाता है।
योग चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण है। योगाभ्यास से द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है। यदि चहुंओर दृष्टि को किया जाये तो मालूम होगा कि लोग स्वयं अनुशासित न होकर केवल अन्यों को अनुशासित होने की सीख देते मिल जायेंगे। लेकिन जो व्यक्ति स्वयं अनुशासित नहीं है,वह दूसरों को अनुशासित होने की सीख कैसे दे सकता है? और यदि वह ऐसा करेगा भी तो उसकी सीख का किसी पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।सब सबको अनुशासन सिखला रहे हैं लेकिन स्वयं उच्छृंखल बने हुये हैं।जिनका स्वयं के आहार,विहार,पोशाक,सोने,जागने, चरित्र,आचरण,संवाद, शिक्षा, स्वाध्याय आदि में कोई अनुशासन नहीं है,वो योगाभ्यास में एक कदम भी आगे नहीं बढा सकते हैं।यह अनुशासन कहीं दुकानों पर रुपये देकर नहीं मिलता है अपितु इससे प्रतिदिन अपने आचरण में स्थान देने का तप करना पड़ता है। किसी दूसरे का अनुशासन केवल उसके हित के लिये होता है।इसे कहीं से उधार भी नहीं लिया जा सकता है।यह किसी गुरु से भी नहीं मिलता है।यह पद, प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस से भी नहीं मिलता है। तथाकथित बड़े कहे जाने वाले लोगों का यह भ्रम रहता है कि उनको अनुशासन की आवश्यकता नहीं है। लेकिन उनका यह सोचना महामूर्खता है।
6.) योगाभ्यास में सफलता पाने के लिये किसी पाखंडी गुरु का सामीप्य और उससे नामदान या दीक्षा आदि लेना,कोई बड़ा प्रशासनिक पद, सामाजिक -राजनीतिक प्रतिष्ठा और बैंक बैलेंस आदि का महत्व बिल्कुल गौण यानी न के समान है।इस प्रकार की मूढताओं से बचना आवश्यक है। किसी योग्य और समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में सतत् अभ्यास और अनासक्ति से साधना करते रहें। अभ्यास और अनासक्ति स्वयं ही करने होते हैं।कोई दूसरा आपके लिये यह सब नहीं कर सकता है।यह कोई ऐसा अनुष्ठान या कर्मकांड नहीं है जिसको करे कोई अन्य और फल आपको मिल जाये।ऐसा असंभव है। यहां सिफारिश नहीं चलती है। यहां चापलूसी और धनाढ्य होने की अकड़ नहीं चलती है।इसीलिये इसको शुरू में ही स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि कहते हैं –
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध:।। (योगसूत्र, समाधिपाद,12)
यानी सतत् अभ्यास और अनासक्ति से चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण हो सकता है।
7.) ‘योग’ कोई व्यायाम,कसरत, शारीरिक तोड़-मरोड़,सैर, प्रतियोगिता या खेल नहीं है।यह किसी से आगे जाने या किसी से पीछे होना नहीं है।यह स्वयं के द्वारा,स्वयं के ऊपर और स्वयं में रुपांतरण का विज्ञान है।पिछले कुछ वर्षों से ‘योग’ को एक खेल के रूप में प्रचलित करके एक प्रतियोगिता कहा जा रहा है।यह ठीक नहीं है। प्रतियोगिताओं के रूप में जो भी आजकल 21 जून को या योग केंद्रों और शिक्षा संस्थानों में किया जा रहा है,वह न तो योगासन है,न योगाभ्यास है बल्कि एक प्रकार की व्यायामासन खेल प्रतियोगिता है।इसका सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई भी संबंध नहीं है। इसके अतिरिक्त देश- विदेशों में योगाभ्यास की आड़ में जो हाटयोग,स्काईयोग, म्यूजिकयोग,
रोपयोग,रिदमयोग,वार्मअप योग,उछल-कूद योग,आईसयोग,वैपरयोग,बाबायोग,जग्गीयोग, श्री श्री योग आदि विभिन्न प्रकार के मूढतापूर्ण प्रयोग करवाये जा रहे हैं, उनका भी सनातन भारतीय योगाभ्यास से कोई लेना-देना नहीं है।इन सबसे साधकों को कुछ शारीरिक लाभ और गुरुओं को प्रसिद्धि के साथ धन- दौलत अवश्य मिल जाते हैं, लेकिन वृत्तियों के नियंत्रण में इनका कोई योगदान नहीं है।
8.) महर्षि पतंजलि ने एक महत्वपूर्ण सूत्र ‘चित्तवृत्तिनिरोध’ से भिन्न चित्त की अवस्था के संबंध में कहा है।जब चित्त की वृत्तियों पर द्रष्टा यानी किसी साधक या व्यक्ति का नियंत्रण नहीं होता है तो चित्त काम, क्रोध ,लोभ,मोह,द्वेष, ईर्ष्या, कामुकता, बदले की भावना,प्रेम, घृणा आदि वृत्तियों जैसा ही हो जाता है।चित्त के कार्य करने की प्रक्रिया जैसे जटिल विषय को इतनी सरलता और सहजता से आज तक किसी भी योगी और मनोविद् ने नहीं समझाया है। इससे एक विषयासक्त और इंद्रियजयी,भोगी और योगी व्यक्ति में भेद-रेखा स्पष्टता से पहचान में आ जाती है। भौतिकविद् भौतिक पदार्थ पर काम करते हैं जबकि अध्यात्मविद् चेतना पर काम करते हैं। आचार्य रजनीश ने महर्षि पतंजलि को चेतना का वैज्ञानिक कहा है। लाखों वर्षों के कालखंड में दस प्रसिद्ध भारतीय मनीषियों में उन्होंने महर्षि पतंजलि को भी गिनवाया है। चित्तवृत्तिनिरोध से भिन्न चित्त के संबंध में महर्षि पतंजलि कहते हैं –
वृत्तिसारुप्यमितरत्र।।( समाधिपाद,4)
9.) योग – महाविज्ञान में मौजूद श्वास और मन के परस्पर संबंध के रहस्य को उद्घाटित करते हुये हठयोगी स्वात्माराम ने कहा है-
चले वाते चलं चितं निश्चले निश्चलं भवेत्।
योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्।।
( हठयोग प्रदीपिका,2/2)
इसका अर्थ है कि जब श्वास -प्रश्वास चलती है तो मन भी चलता है और जब श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण हो जाता है तो मन पर भी नियंत्रण हो जाता है। श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण होने से योगाभ्यासी को अचल मन: स्थिति प्राप्त हो जाती है। वह अडिग बन जाता है। बाहरी विषय उसे परेशान नहीं कर सकते। विषयों की ओर जाते हुये मन पर उसका पूर्ण नियंत्रण हो जाता है।इस श्लोक से यह पूरी तरह से समझ में आता है कि या तो श्वास -प्रश्वास पर नियंत्रण कर लो या फिर मन पर नियंत्रण कर लो। पहले वाले योग साधक को प्राणयोगी तथा दूसरे वाले योग साधक को राजयोगी कहा गया है। सीधे ही मन पर या विचारों पर नियंत्रण लगभग असम्भव है, इसलिये सर्वप्रथम यम,नियम, आसन वाले तीन अनुशासन में पारंगत होकर प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये। प्राणायाम महर्षि पतंजलि के अष्टांगयोग में चौथा अनुशासन है।
10.) यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि चारों तरफ जो योग -केंद्रों, पार्कों,बाग- बगीचों, सरकारी कार्यालयों और शिक्षा -संस्थानों में योगाभ्यास करने वालों की भीड़-भाड़ दिखाई दे रही है,वह किस प्रकार का योगाभ्यास कर रही है?इस योगाभ्यास में महर्षि पतंजलि प्रोक्त योग के चौथे अनुशासन ‘प्राणायाम’ या हठयोग के ग्रंथों में वर्णित आठ प्रकार के प्राणायामों का सही तरीके से अभ्यास किया या करवाया जा रहा है या नहीं? भारत और विदेशों में स्थित लाखों योग -केंद्रों में से गिनती के योग केंद्र ऐसे होंगे, जहां पर सनातन शास्त्रीय मर्यादा अनुसार प्राणायाम का अभ्यास किया और करवाया जाता है। अधिकांश जगहों पर प्राणायाम की आड़ में सिर्फ गहरी श्वसन क्रिया का अभ्यास हो रहा है। सही तरीके से प्राणायाम करने के लिये सर्वप्रथम यम, नियमों को आचरण में स्थान देकर घंटे आधे घंटे तक एकासन में अविचल बैठने का अभ्यास आवश्यक है। आजकल के आपाधापी और व्यापार के युग में किसी के पास न तो इतना समय ही है तथा न ही किसी के पास इतना संयम और तप है। बड़े बड़े धुरंधर अंतरराष्ट्रीय योगी कहलाने वाले लोग भी प्राणायाम के नाम पर सिर्फ श्वास- प्रश्वास का अभ्यास कर और करवा रहे हैं।यही कारण है कि इस प्रकार के नकली प्राणायाम का कोई गहरा और स्थायी प्रभाव साधकों के शरीर, प्राण, विचार,मन और भावनाओं पर नहीं पड़ रहा है। और इसीलिये आजकल के इन प्रसिद्ध योगाचार्यों, संतों, बाबाओं और योग महर्षियों को या तो अपने आयुर्वेदिक उत्पाद के रूप में चूर्ण, चटनी,टाफी,जूस, च्यवनप्राश, हैल्थ ड्रिंक,जींस,कच्छे, बनियान,सैक्सवर्धक गोलियां
बनाकर बेचने पड़ रहे हैं या फिर गंडे, ताबीज़, कड़े,माला,धागे,भभूत, नारियल, मूर्तियां,लाकेट,अंगुठियां, रुद्राक्ष और मिट्टी आदि बेचने पड़ रहे हैं। इनके नकली योगाभ्यास , जल्दी सफलता पाने की महत्वाकांक्षा, धन- दौलत की चाह,अंधभक्तों की भीड़-भाड़, आलीशान आश्रमों का लालच और महंगी गाड़ियों की वासना और विज्ञापन की धूमधाम के कारण यह सब हो रहा है। यदि ऐसे उच्छृंखल भोगी लोगों को योगी या योगाचार्य कहोगे तो अभ्यास, वैराग्य, संयम, त्याग, तपस्या, करुणा , अपरिग्रह, संतोष, अहिंसा,सत्य, ब्रह्मचर्य,शौच, स्वाध्याय आदि का आचरण करने वाले योगियों को क्या कहोगे?
11.)पिछले 100-125 वर्षों के दौरान आसन को व्यायाम के रूप में प्रचलित करने में अनेक योगाचार्य सम्मिलित हैं।आसन के द्वारा शारीरिक सौष्ठव, सौंदर्य और देहयष्टि को सुडौल बनाने पर जोर देकर इन्होंने योग साधकों को’चित्तवृत्तिनिरोध’ से दूर ले जाने में सहयोग करके योग के मूल-भाव को जनमानस से लुप्त सा कर दिया है।रह रहकर ये योगाचार्य मन नियंत्रण की बातें भी करते रहे लेकिन जनमानस में शरीर और इंद्रियों के प्रति सहज राग होने के कारण उन्हें योग का यह विकृत और आधा अधुरा रुप ही ठीक लगा। ‘महाजनों येन गत: स पंथा’ की सीख को शिरोधार्य करके इन्होंने इसे ही वास्तविक योग स्वीकार कर लिया। पाश्चात्य औपनिवेशिक विचारकों का भी यही लक्ष्य था कि किसी तरह मन नियंत्रण वाली इस सनातन योग विद्या को अब्राहमिक भौतिकवादी जडवादी उपयोगितावादी रुप दे दिया जाये। योगेन्द्र,कुवलयानंद,कृष्णामाचार्य, अयंगर, भारतीय योग संस्थान,आर्य वीर दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाद में रामदेव आदि द्वारा इसी को खूब प्रचारित किया गया।आज यह शारीरिक तोड़-मरोड़ वाला व्यायाम,कसरत और खेल ही योग बनकर रह गया है। लेकिन यह पूरी तरह से भटकाव है। आश्चर्यजनक है कि इनमें से आर्यसमाज को छोड़कर किसी संगठन ने भी भारत की स्वतंत्रता के संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। पता नहीं किसलिये ये अपने शरीरों को मजबूत बना रहे थे?21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने में भी योग की यही आधकचरी अवधारणा प्रचारित हो गई है।
12.) महर्षि पतंजलि ने अपने 5500 वर्षों पुरातन ‘योगसूत्र’ में आसन को अष्टांगयोग में तीसरा अनुशासन कहा है। इसमें आसन को देह की स्थिरता, सहजता,दृढता आदि के रूप में लिया है।आसन को स्पष्ट करते हुये महर्षि पतंजलि ने तीन सूत्र दिये हैं –
स्थिरसुखमासनम्।।
प्रयत्नशैथिल्यअनंतसमाप्तिभ्याम्।।
ततो द्वंद्वान्भिघात:।।
(योगसूत्र,साधनपाद,46-48)
इनका अर्थ है स्थिरता और सुखपूर्वक बैठना आसन है।आसन में इस प्रकार बैठने से शरीर की सभी हलचल समाप्त होकर साधक अपने निज स्वरूप में स्थित होने की ओर अग्रसर होता है। इससे सुख- दुख, सर्दी- गर्मी और मौसम परिवर्तन को सहने की योग्यता अर्जित हो जाती है। इसके पश्चात् ही कोई योग- साधक योग के चौथे अनुशासन ‘प्राणायाम’ का अभ्यास करने में समर्थ होता है। ध्यान रखने की बात यह है कि इस प्रकार से आसन का अभ्यास शायद ही कोई योग -केंद्र या योगाश्रम करवाता होगा। वास्तविकता यह है कि आसन की जिस अवधारणा को आजकल प्रचलित कर दिया गया है,वह अवधारणा पुरातन काल में नटों और युद्धक कला का अभ्यास करने वालों के लिये होती थी।इसे आजकल ‘मार्शल आर्ट’ कह दिया जाता है।भारत की पुरातन युद्धक कला ‘कलारीपयट्टू’ से ही संसार की सभी मार्शल आर्ट का विकास हुआ है।
13.) ‘योगा फार हैल्दी एजिंग’ का लक्ष्य केवल कसरत करने, व्यायाम करने, शारीरिक तोड़-मरोड़ करने और नटबाजी से कैसे हासिल होगा?इस पर विचार न करके अरबों रुपए प्रचार -प्रसार पर उडाये जा रहे हैं।कसरत और व्यायाम करना तो पहले से ही मौजूद है। क्या ऐसे लोगों का बुढ़ापा सुखप्रद और आरोग्यप्रद होता है? कहीं ऐसा दिखाई तो नहीं दे रहा है।हर तरफ चिकित्सकों के वहां पचास-साठ वर्ष के लोगों की भीड़ लगी रहती है।अस्थमा,श्वास ,शूगर, खांसी,घूटनों की खराबी, जोड़ों में दर्द,लीवर सूजन,गूर्दो में विकार, मोतियाबिंद आदि भयंकर बिमारियों से ग्रस्त बुजुर्ग लोगों की चिकित्सा या इन बिमारियों की रोकथाम क्या कसरत, व्यायाम, नटबाजी रुपी नकली योगाभ्यास से हो जायेगी?साक्ष्य आधारित विज्ञान का युग होने का दंभ भरने वाले शिक्षक, प्रोफेसर, चिकित्सक, योगाचार्य, वैज्ञानिक, शोधार्थी भी इस विषय पर प्रश्न, जिज्ञासा, संदेह नहीं कर रहे हैं। चापलूसी,अंधभक्ति, हां जी – हां जी करके मूंडी हिलाने वाली मंदबुद्धि भीड़ सनातन- विद्या ‘योग और योगाभ्यास’ का कल्याण कैसे करेगी? किसी को भी इसकी चिंता नहीं है। सभी अपने- अपने नंबर बनाने, फोटो खिंचवाने और सर्टिफिकेट लेने में लगे हुये हैं।
14.)छुटभय्ये वैज्ञानिक भी होते हैं।अधकचरे वैज्ञानिक भी होते हैं।प्रकृति को केवल भोग की वस्तु मानने वाले वैज्ञानिक ही होते हैं। सुंदर धरती ग्रह को अधिकांश जीव- जंतुओं के लिये नारकीय बना देने वाले भी वैज्ञानिक ही होते हैं। एकतरफा तथ्य को महत्व देकर सत्य के विरोधी भी वैज्ञानिक होते हैं। मनुष्य में मौजूद अनेक प्रकार की शक्तियों में से केवल विचार को प्रधान मानकर भाव के विरोधी भी वैज्ञानिक ही होते हैं।स्वार्थ और बस उपयोगिता की प्रधानता।यूज एंड थ्रो और डिवाईड एंड रूल।तोडते जाओ और तोड़ते जाओ।गुरुओं और वैज्ञानिकों का यह धंधा बन चुका है। दोनों एक ही नाव में सवार हैं। समझे बिना स्वीकार मत करो। और यदि समझ गये तो स्वीकार अस्वीकार व्यर्थ हो जायेंगे। किसी को पकड़ा तो धोखा खाओगे और यदि नहीं पकड़ा तो पश्चाताप रहेगा कि पकड़ लेते तो पता नहीं कौनसी क्रांति हो जाती।सब कुछ अधकचरा, अपरिपक्व और सतही सा है।इन सबके बीच में हमारी स्वयं की समझ साथ निभाती है। लेकिन उस पर विश्वास न करके किसी गुरु, वैज्ञानिक, ग्रंथ, संप्रदाय पर विश्वास करने की ओर बढ जाते हैं। आज हालात यह हो गई है कि स्वयं की समझ को उजागर करने में हमारे गुरु और भौतिकविद् दोनों बाधा बने हुये हैं। इसमें जिस विषय से सर्वाधिक मदद मिल सकती है,उस विषय ‘योग और योगाभ्यास’ का कबाड़ा कर दिया गया है। जहां भौतिक विज्ञान के अपने नियम और अनुशासन होते हैं, वहीं पर ‘योग- महाविज्ञान’ के अपने नियम, अनुशासन,संयम, तपस्या और सावधानियां आदि होते हैं। लेकिन महीना दो महीना शारीरिक कसरत और उठा-पटक करवाकर लोगों को प्रामाणिक योग शिक्षक के सर्टिफिकेट लाखों की संख्या में वितरित किये जा रहे हैं। जिनको इस योग विद्या का क ख ग भी नहीं आता है,वो भी भारत प्रसिद्ध योगाचार्य और योग -विशेषज्ञ बनकर लाखों लोगों को योगाभ्यास करवा रहे हैं।
15.)आगे को बढी और नीचे लटकी हुई बड़ी- बड़ी तोंद, भारी- भरकम कमर,आंखों पर बड़े -बड़े चश्मे,टाईट पोशाक,चमड़े की धारण की हुई टाईट बैल्ट और धन- दौलत -पद- प्रतिष्ठा- प्रधानी की हिमालय समान अकड़ – आज के अधिकांश योग- शिक्षकों और योगाभ्यास के हिमायतियों की यही पहचान है। कोई कुछ टिप्पणी कर दे तो देशद्रोही, पाकिस्तानी, खालिस्तानी घोषित कर देंगे।इनकी हरेक तर्कहीन और उल्टी-सीधी बात को मान लो तो ठीक वरना आपकी खैर नहीं। ज्यों ही कोई विद्या या विषय या व्यक्ति प्रसिद्ध हुआ नहीं कि वोट के भूखे लूटरे नेता लोग वहां पर जबरदस्ती से प्रवेश करके सब गुड़ गोबर कर देते हैं। और आजकल के योगाचार्यों और धर्माचार्यों को मोह, माया,पद,प्रतिष्ठा,धन, दौलत से इतना अधिक लगाव है कि ये तुरंत धूर्त नेताओं से सांठगांठ कर लेते हैं।योग और योगाभ्यास जाये भाड़ में।बस भारत और भारत से बाहर यही चल रहा है।
……
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119




