साहित्य

पिता-स्मृति 

पूर्णिमा सुमन

ता से माँगा कुछ नहीं, मिला स्नेह भरपूर।

उनके रहते दूर थे, जीवन के सब शूल॥

 

प्यार दिया, विश्वास दिया, दी मन को पहचान।

उनके दम से ही मिली, मुझको नई उड़ान॥

 

जब-जब मन डगमगा गया, थामा मेरा हाथ।

आँधी, वर्षा, धूप में, छोड़ा नहीं था साथ॥

 

अपने दुख को पी गए, रखी अधर मुस्कान।

मेरे हित करते रहे, जीवन भर बलिदान॥

 

धूप स्वयं सहते रहे, मुझको दी थी छाँह।

उनके कारण सरल थी, जीवन-पथ की राह॥

 

छोटे-छोटे स्वप्न को, देते रहे विस्तार।

मेरे हर उत्साह में, रहता था अधिकार॥

 

जब तक थे, तब तक लगा, जग में सब आसान।

जाने पर समझा पिता, थे घर की पहचान॥

 

सूना आँगन हो गया, सूना हर त्योहार।

उन बिन जैसे खो गया, घर का सारा प्यार॥

 

यादों के दीपक जले, भीगे नयन अपार।

मन के मंदिर में रहे, उनका ही सत्कार॥

 

आज व्यथित मन पूछता, कहाँ गया वह साथ।

जिसने मेरी हर खुशी, रख दी थी अपने हाथ॥

 

माथे पर आशीष की, अब भी है वह छाप।

संकट आते हैं मगर, दिखते उनके आप॥

 

जीवन की हर जीत में, उनका रहा प्रभाव।

मेरी पूरी काया में, बसते उनके भाव॥

 

सत्य, श्रम और नेह का, देकर गए विधान।

उनके पदचिह्नों पर ही, चलता है सम्मान॥

 

नश्वर है यह देह पर, अमर रहे उपकार।

पिता नहीं बस नाम थे, जीवन का आधार॥

 

नमन करूँ हर साँस से, करूँ हृदय से ध्यान।

पिता तुम्हारा ऋण कभी, सके न कोई चुकान॥

 

पूर्णिमा सुमन

कवयित्री/लेखिका

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