साहित्य

गीत बन कागज़ पे सजते

पूर्णिमा सुमन

भाव मन के जब उमड़ते, नेह के उद्गार हैं।

गीत बन कागज पे सजते, स्वप्न के संसार हैं॥

पीर मन की बोल उठती, शब्द के झंकार हैं।

भाव जब आकार पाते, गीत के विस्तार हैं॥

 

अंतरा – १

याद जब आकर हृदय में, चुपके से दस्तक करे।

मौन के सूने भवन में, राग मधुर गुंजन भरे॥

दर्द की हर एक धड़कन, छंद का आकार है।

गीत बन कागज पे सजते, स्वप्न के संसार हैं॥

 

अंतरा – २

प्रेम की कोमल लहर जब, मन नदी में बह चली।

भाव की कलियाँ हृदय में, देखकर ऋतुएं खिली॥

कल्पनाएँ रंग भरतीं, चेतना साकार है।

गीत बन कागज पे सजते, स्वप्न के संसार हैं॥

 

अंतरा – ३

हर्ष हो अथवा व्यथा हो, लेखनी रुकती नहीं।

मन गगन में उड़ रहे जो, कल्पना झुकती नहीं॥

सत्य मन की अनुभूतियों का, यह मधुर उपहार है।

गीत बन कागज पे सजते, स्वप्न के संसार हैं॥

 

याद की पुरवाई बहती, मन खिले गुलज़ार हैं।

भींगते एहसास सारे, नेह के उपहार हैं॥

मौन के गहरे समंदर, बोलते हैं रात-दिन।

भाव जब कागज़ पर उतरें, गीत के विस्तार हैं॥

 

पूर्णिमा सुमन

कवयित्री/लेखिका

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