साहित्य

भारत भू ही बनी वेदिका

लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

बिना वेदिका अनुष्ठान क्या, मंच बिना कैसा अभिनय ।

उन्मुक्त हुआ था आजादी में, जन आंदोलन था सविनय।।

 

संघर्ष छिड़ा था आजादी का, भारत भू ही बनी वेदिका ।

तब आहुति की होड़ लगी थी, माँ बहने सब बनी सेविका ।।

अनल कुण्ड में भस्मीकृत को,मेधा अर्पण का करे विनय ।

 

मंच सजाते छद्म-वेष में, छायें विकट कटक उन्मादी ।

गरज रहे थे मेघ,अश्नि का, जैसे गूँजे घोर प्रमादी ।।

अग्नि देव की स्वाहा पत्नी, मेधा पा स्वीकारें अनुनय ।

 

भेद भूमितल अनल प्रबल दल, चीर गोलियों की बौछारे।

तत्पर रहते खुद प्राणों को, न्यौछावर करने को सारे ।।

भू की छाती फट स्वीकारे, भूमि सुता अनुरोध बिनय ।

 

*अश्नी =बिजली*

 

*-लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’

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