
बिना वेदिका अनुष्ठान क्या, मंच बिना कैसा अभिनय ।
उन्मुक्त हुआ था आजादी में, जन आंदोलन था सविनय।।
संघर्ष छिड़ा था आजादी का, भारत भू ही बनी वेदिका ।
तब आहुति की होड़ लगी थी, माँ बहने सब बनी सेविका ।।
अनल कुण्ड में भस्मीकृत को,मेधा अर्पण का करे विनय ।
मंच सजाते छद्म-वेष में, छायें विकट कटक उन्मादी ।
गरज रहे थे मेघ,अश्नि का, जैसे गूँजे घोर प्रमादी ।।
अग्नि देव की स्वाहा पत्नी, मेधा पा स्वीकारें अनुनय ।
भेद भूमितल अनल प्रबल दल, चीर गोलियों की बौछारे।
तत्पर रहते खुद प्राणों को, न्यौछावर करने को सारे ।।
भू की छाती फट स्वीकारे, भूमि सुता अनुरोध बिनय ।
*अश्नी =बिजली*
*-लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’



