साहित्य

गीत

डॉ रमेश कटारिया

बैठे बैठे सोच रहे क्यूँ गांव से आये बाबूजी

ऊपर से ख़ुश दिखते अन्दर से पछताये बाबूजी

 

बहुएं आपस मेंं इक दूजे से बात नहीँ करतीं हैँ

 

जानें क्यूँ इन की आपस मेंं कभी नहीँ बनती हैँ

 

इनकी लड़ाई देख देख कर अम्मा भी डरती है

 

सोच रहे हैँ कुछ ऊँचा नीचा ना हो जाये बाबूजी

 

गांव से शहर मेंं आकर बहुत पछताये बाबूजी

 

बाबूजी से मिलने शहर मेंं उनका दोस्त आया जब

 

गले मिले दोनोँ को बीता ज़माना याद आया तब

 

कालेज़ वाले दिन याद करके सारा दिन बिताया जब

 

 

दिल से लेकर आंखो तक भर भर आये बाबूजी

 

गांव से आकर शहर मेंं बहुत पछताये बाबूजी

 

अम्मा जिस दिन से गईं हमारी परमपिता के पास

 

उस दिन से बाबूजी हरदम रहनें लगे उदास

 

अम्मा जबसे स्वर्ग सिधारी

भूल गये सब पान सुपारी

 

 

कभी वे घर के अन्दर जाते कभी बाहर आएँ बाबूजी

 

 

गांव से आकर शहर में बहुत पछताए बाबूजी

 

जब दुबई से छोटा भईया गांव मेंं आया था

 

बाबूजी नें हुसक हुसक के उसको गले लगाया था

 

 

गांव के गौरी ताल पे उसके संग खूब नहाए बाबूजी

 

नन्हे किष्षु को दादाजी पर बहुत प्यार जब आया

 

 

पीठ पे चढ़कर दादाजी को घोड़ा उसने बनाया

 

बनकर घोड़ा खुशी खुशी खूब मुस्काये बाबूजी

 

 

इन्नी सौम्या मुदित साक्षी और मान्या

 

सबको प्यारी लगती अपनी दादी माँ

 

इन पाँचों को दुनियाँ से न्यारी लगती दादी माँ

 

इनका प्रेम देख के मन्द मन्द मुस्काये बाबू ज़ी

 

गांव की गलियाँ पनघट मन्दिर बहुत याद आते हैँ

 

बूढ़ा पीपल नीम और बरगद मन को हरषाते हैँ

 

 

सपनों मेंं कई बार गांव मेंं घूम के आये बाबूजी

 

 

गांव छोड़कर शहर मेंं आकर सबको भाए बाबूजी

 

 

बुआ हमारी बहने उनकी जब घर मेंं आती हैँ

 

 

सारे घर मेंं हर तरफ़ इक रौनक छा जाती है

 

फूफा ज़ी के संग छत पर जाकर खूब बतियाए बाबूजी

 

बच्चों के संग बच्चे बनकर के बहुत हरषाऎं बाबूजी

 

चाचा किसको ताऊ किसको किसको मामा कहते हैँ

 

किसको फूफा किसको मौसा किसको बुआ कहते हैँ

 

बच्चों को कुछ पता नहीँ समझा ना पाये बाबूजी

 

बैठे बैठे सोच रहे क्यों गांव से आये बाबूजी

 

मौसी ताई बुआ चाची मामी दादी और परदादी

 

एक बार मिले थे जब हुईं थी चाचू की शादी

 

किसको क्या बतलाएँ रिश्ते बतला ना पाये बाबू ज़ी

 

बैठे बैठे सोच रहे क्यों गांव से आये बाबू ज़ी

 

 

 

पहले तो सब बहुएँ मिल कर हाँ ज़ी हाँज़ी कहती हैँ

 

जबसे हिस्सा बांट हुआ है

सामने आने से बचती हैँ

 

 

कर बैठे जबसे बटवारा

मौसम बदल गया है सारा

 

ऐसा अन्त देख देख कर घबराए बाबूजी

 

 

डॉ रमेश कटारिया पारस

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