साहित्य

अधूरी तलाश

लक्ष्मी दीक्षित

 

तेरे दीदार की मेरे अक्स को तलाश है,
आईने में भी अब चेहरा मेरा बे-लिबास है।

तू पास नहीं तो रोशनी भी धुंधली सी लगती है,
जैसे कोहरे की परतों के पीछे छिपी मेरी ही लाश है।

एक कसक सी जो दबी है दिल में,
वो रह-रह कर मुझे चिढ़ाती है।

पुरानी यादों की दबी हुई वो राख,
आज भी सुलगकर धुआं फैलाती है।

वो आरजू अब भी बदहवास है,
जैसे कोई परिंदा पिंजरे में छटपटाता हो।

या फिर कोई मुसाफिर तपती धूप में,
दूर कहीं ठंडी छांव को बुलाता हो।

हकीकत न सही, तू ख्वाब बनकर ही आ,
मेरे इस बंजर दिल का गुलाब बनकर आ।

इंतज़ार की ये इंतिहा अब और सही नहीं जाती,
मेरे हर हर्फ का तू मुकम्मल जवाब बनकर आ।

© लक्ष्मी दीक्षित
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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