साहित्य

मैं राम हूं 

गरिमा शर्मा

मैं राम हूं,

मुझे राम रहने दो ।

मानव के हृदय में बसा हूं मैं,

मुझे सरस जीवन का अरमान रहने दो।

 

मैं मंदिरों की शान नहीं, भक्तों की आन हूं।

मुझे सरकारी बनाकर मत बेचो,

बस धर्म की पहचान रहने दो।

मेरे नाम से रोज यू मत खेलो,

मुझे बस राम रहने दो।

 

आज हर रोज़ बिक रहा हूं मैं,

मुझे सूर्यवंश की संतान रहने दो।

मैं सदा से मर्यादित हूं,

मैं राम हूं।

मुझे राम रहने दो।

 

सरयू की शीतल लहर सा शीतल हूं,

मुझे क्रोध से अनजान रहने दो।

मैं सदा से पुरुषोत्तम हूं।

मुझे अवध की बानी में,

बस आम रहने दो।

 

इस कलयुग के तमस में भयभीत सा हूँ

मुझे हर युग का बस मान रहने दो।

राजनीतिक गलियारों से कुछ दूर

मुझे बस तुलसी का राम रहने दो।

 

गरिमा शर्मा

झाबुआ (मध्य प्रदेश)

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