
माटी के संत और मालवा की माटी
मालव माटी गहन-गंभीर, डग-डग नीर और पग-पग रोटी,
जहाँ बहे कबीर की बानी, छूटे मोह-माया की खोटी।
तम्बूर की झंकार में गूँजे, अलख निरंजन की धुन प्यारी,
सतगुरु के चरणों में झुकती, संतों की यह महिमा न्यारी।
तन की चुनरिया पल-पल मैली, ज्ञान का साबुन इसे नहलाए,
काया रूपी कच्ची मटकिया, सहज ही शून्य समाधि लगाए।
कोई गावे कबीर के दोहे, कोई मीरा का अनहद गावे,
पी-पी अमृत प्रेम का प्याला, मनवा तृप्त हो जाए।
शब्द नहीं, यहाँ मौन की भाषा, प्रेम का बीज बोती है,
मालवा की संतों की धरती, सचमुच सबसे अनोखी है!
स्वरचित रचना
संगीता वर्मा,कानपुर उत्तर प्रदेश




