
सम्बल, यादें ही हैं कम्बल
ओढ़ लो,बिछा लो,फिर भी नहीं चुकती यादें।
कितनी भूली-बिसरी यादें, मौका पा अंकुरित होती यादें।
जीवन का हर लम्हा-लम्हा गुलज़ार इन्हीं यादों से,
सहेजने-समेटने की नहीं ज़रूरत,
खुद-ब-खुद जातीं सिमट,
मन-मस्तिष्क ही स्मृति-कुंज है,
रहती हरदम आबाद जहाँ यादें।
जीवन का हर रंग भरा इनमें,
कैसे घुल-मिल कर रहती यादें,
भेद-भाव न बरतें यादें।
जितने भाव औ रंग हैं जीवन के,
उतने ही रूप-रंग आकार-प्रकार की यादें।
अनगिनत-असंख्य होती हैं यादें,
मुकुलित-सुरभित-पुष्पित यादें।
सीख सको तो सीख लो इनसे,
प्रेम-सौहार्द का बीज लो इनसे,
आपस का सामंजस्य है अद्भुत,
श्वासों के अन्तिम पल तक, अवसर की राह तकती हैं यादें।।
रचनाकार –
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




