साहित्य

वंदना

दिनेश पाल सिंह

उमड़ रहे हैं मेघ गगन में, नव संगीत सुनाने को,

सूखी धरती के अधरों पर, फिर मुस्कान सजाने को।

 

प्यासे पत्ते बाँह पसारे, बूँदों का सत्कार करें,

नदियाँ अपनी चुप्पी तोड़ें, सागर से संवाद करें।

 

मिट्टी ने जब भीगी चुनरी, ओढ़ी बड़े सलीके से,

सोंधी-सोंधी गंध बही, जैसे माँ के आँचल से।

 

आम्र-वृक्ष ने झूम-झूमकर, सावन का अभिनंदन किया,

नीम ने अपनी हर डाली पर, हरियाली का वंदन किया।

 

गौरैया की चहक सुनो तो, जैसे मंगल-गान लगे,

मोर-पंख में इंद्रधनुष के, सातों रंग मेहमान लगे।

 

कली-कली ने खोल दिए फिर, अपने सपनों के कपाट,

हर बूँद लिखती चली धरा पर, जीवन का नव स्वर्ण-प्रभात।

 

वर्षा केवल जल नहीं है, ईश्वर का विश्वास भी है,

सूखे मन में अंकुर फूटें, ऐसा मधुमय श्वास भी है।

 

आओ मिलकर मान करें हम, इस अनुपम वरदान का,

हरियाली का दीप जलाएँ, आदर करें प्रकृति-महान का।

 

कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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