
घन बन प्रियतम नभ से उतरे, धरा बनी अभिसार।
रिमझिम बूँदों में लिख डाला, पावस का सत्कार॥
विरह-विकल धरती ने खोले, नेह-भरे सब द्वार।
मंद पवन के संग बह निकले, मन के मधुर विचार॥
दामिनि ने मुस्काकर भेजे, चंचल दृग-उपहार।
भीगे तन-मन, महका जीवन, पाकर प्रिय का प्यार॥
मोर पंख फैलाए नाचे, सुनकर मेघ-मल्हार।
कली-कली के अधरों फूटा, मधु-सा हर्ष-उच्चार॥
नदिया ने उन्मुक्त हृदय से, गाया प्रेम पुकार।
पग-पग अंकुर फूट पड़े ले, नवजीवन विस्तार॥
सखियाँ झूले डाल सजाकर, गाएँ मंगल-गान।
हरियाली की चुनर ओढ़े, पुलकित हुआ जहान॥
चहुँदिशि छाया नेह पावस का, जागे मधुर अरमान।
प्रेम-सुधा बरसाता सावन, करता जग कल्याण॥
तन की तपन हृदय की पीड़ा, धो गई रसधार।
धरा-गगन के मंगल मिलन का, बना मधुर आधार॥
सृष्टि-सृष्टि में गूँज उठा फिर, प्रेमिल जय-जयकार।
घन बन प्रियतम नभ से उतरे, धरा बनी अभिसार॥
पूर्णिमा सुमन




