साहित्य

पावस का अभिसार

सुमन

घन बन प्रियतम नभ से उतरे, धरा बनी अभिसार।

रिमझिम बूँदों में लिख डाला, पावस का सत्कार॥

 

विरह-विकल धरती ने खोले, नेह-भरे सब द्वार।

मंद पवन के संग बह निकले, मन के मधुर विचार॥

दामिनि ने मुस्काकर भेजे, चंचल दृग-उपहार।

भीगे तन-मन, महका जीवन, पाकर प्रिय का प्यार॥

 

मोर पंख फैलाए नाचे, सुनकर मेघ-मल्हार।

कली-कली के अधरों फूटा, मधु-सा हर्ष-उच्चार॥

नदिया ने उन्मुक्त हृदय से, गाया प्रेम पुकार।

पग-पग अंकुर फूट पड़े ले, नवजीवन विस्तार॥

 

सखियाँ झूले डाल सजाकर, गाएँ मंगल-गान।

हरियाली की चुनर ओढ़े, पुलकित हुआ जहान॥

चहुँदिशि छाया नेह पावस का, जागे मधुर अरमान।

प्रेम-सुधा बरसाता सावन, करता जग कल्याण॥

 

तन की तपन हृदय की पीड़ा, धो गई रसधार।

धरा-गगन के मंगल मिलन का, बना मधुर आधार॥

सृष्टि-सृष्टि में गूँज उठा फिर, प्रेमिल जय-जयकार।

घन बन प्रियतम नभ से उतरे, धरा बनी अभिसार॥

 

पूर्णिमा सुमन

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