
#विधा – काब्य,
#दिनांक -03/07/2026,
#विषय – आये आशाड़,
#स्वरचित, मौलिक
गरज गरज क़े सब को,
सावधान करते ये अशाड़ क़े मेघ,
प्यासी धरती अकुला कर उनसे
जा लिपटी।
मेघों से आती मंद मंद बूँदें को,
अपने आंचल में समेट रही धरा,
सुहाग सुख से हरि और भरी,
सौंधी सौंधी सी महक रही धरा,
धरती को खुश देख पेड़ भी लगे
अब मुस्कुराने,
सूरज ने भी ली राहत की सांस ,
मिला कुछ पल कें लिए विश्राम,
पंछी भी गाने लगे अब मंगल गान ,
नदियों में फिर जागी मुस्कान।
प्रकृति ने कर लिया हरित शृंगार ,
आषाढ़ ले कर आया प्यार,
और तपती गर्मी से राहत का उपहार।
पंकज एस पाण्डेय, शिकोहाबाद !!!




