
ह दीप जला कर चली गई
मैं उसकी रक्षा में लगा हुआ
वह अपनापन दे चली गई
मैं उस अपनेपन में खोया हूं
वह सुख सुकून दे छोड़ गई
मैं उन अहसासों में जीता हूं
कुछ गुजरने का मंत्र दे गई
मैं उसी मंत्र को जपता हूं
वह हरदम साथ बनी हुई
मैं उसी साथ ले घूमता हूं
वह है तो सब कुछ सह जाता
वह रूप नहीं रूह है ,प्रणाम
डॉ रामशंक चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश



