
प्रिय! बसो आय मोरे नैनन में,
मैं काजल नाहीं डारूंगी।
ना मैं देखूं और को,ना तुझ देखन दूँ।
आवत तुमहि मैं मीचु लूं नैना,
काहू को न देखन देऊं ।
तू मुझमें, मैं तुझमें बस गई,
नैनन सो प्रीत लगाय मेरे मोहन।
तेरे हित ये नैना मोरे, दूजा कबहु न कोय।
तू तो है आँखिन की आभा,
काजल को क्या काम है प्रियतम!
आय बसो मेरे श्याम!
मैं नैना नाहीं खोलूँगी।।
रचयिता –
सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक कृति, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




