खत्म हुआ बारिश का इंतजार,रिमझिम-रिमझिम वर्षा शुरू हुई।
काले-काले-मटमैले, उमड़- घुमड़ बादल नभ में विचरण कर रहे।
घन-घन-घना-घन,टप-टप-टपा-टप बादलों का शोर, चमकी बिजली, तेजी से।
तपस-तपन, गर्मी-चिपकन-
पसीना-धूल-मिट्टी पल भर में गायब हुए।
टीन बोली खड़-खड़-खड़, स्वर मिला रही, नभ कम्पन से, बादल भी मचा रहा शोर।
आ रही आवाजें जैसे ढ़ोल बजा, बादल कह रहा, खुशियों के दिन आये रे भैया, खत्म हुआ इंतजार बारिश का।
यादें हुई ताजा, बारिश जो पड़ रही,जैसे खुशियों के मोती बिखर रहे।
नभ आज धरा से मिलने आ गया, इतना सुन्दर हुआ, मौसम,टिप-टिप-टिप-टिप, मन कर रहा पकडूँ एक-एक बूंद को।
तैर रहे है बादल, कहाँ से कहाँ गये, खुशी से इतरा रहे।
बरस-बरस कर बादलों ने यूँ मचाया शोर, पी रहे हम अदरक-इलायची चाय, पानी में बच्चें नाव चला रहे।
पक्षी जगत की छटा निराली,रुके पानी में डुबक- डुबक-डुबकी लगा रहे।
कलियों ने भी बदला रूप
पुष्प बन सुगंध बिखेर रही।
बढ़ी धरा पर मानव हलचल, खिले चेहरे,बारिश में नहा रहे।
पशु-पक्षी-मानव और खिल गया पर्यावरण।
हिल-हिल कर वृक्ष कह रहे खत्म हुआ बारिश का इंतजार।
डॉ. प्रभा जैन “श्री ”
देहरादून



