साहित्य

शीर्षक-जीवन के चार पहर

पूर्णिमा सुमन

पहर: भोर की बेला (बचपन)

 

किलकारी से गूंज उठा घर, आँगन में शहनाई है,

नन्हें कदमों की आहट से, खुशियों की रुत आई है।

छल-कपट से दूर सुनहरी, वह माटी की ढेरी है,

माँ की थपकी, चंदा मामा, परियों की वह फेरी है।

हंसना-रोना, मचल-मचलना, कोई फिक्र न कल की थी,

जीवन के पहले पहर में, हर इक घड़ी गजब की थी।

 

द्वितीय पहर: दोपहर की धूप (युवावस्था)

 

चढ़ती धूप, उमंगें भारी, पंख लगे अरमानों को,

चीर के अंबर निकल पड़े हैं, छूने को आसमानों को।

रक्त गरम है, थमे न राही, मंज़िल की ही चाहत है,

इस पहर में थकना कैसा, संघर्षों में राहत है।

प्रेम, तरंग, प्रतिज्ञा, सपने, जीवन का मधुमास यही,

कुछ कर गुजरें दुनिया में हम, जगती है विश्वास यही।

 

तृतीय पहर: ढलती सांझ (प्रौढ़ावस्था)

 

सूरज अब धीमा पड़ता है, साया लंबा होता है,

अनुभव की गठरी कंधों पर, मन खोया-खोया रहता है।

नीड़ बनाने की चिंता में, जो तिनका-तिनका जोड़ा था,

बच्चे अब परवाज़ भर रहे, जिनका आँचल पकड़ा था।

ज़िम्मेदारी के धागों में, बंधा हुआ यह जीवन है,

शांत, गंभीर, समझदार सा, अब होता यह मन है।

 

चतुर्थ पहर: शीतल रात (वृद्धावस्था)

 

आई रात, चांदनी छिटकी, सब हलचल अब शांत हुई,

दौड़-भाग की इस दुनिया से, काया अब क्लांत हुई।

यादों के दीपक जलते हैं, विगत दिनों की बातें हैं,

पाया क्या और खोया क्या है, अब समझ में आते हैं।

परमपिता की गोद सामने, अब विदाई की बेला है,

चार पहर का नाटक ख़त्म, जाना सबको अकेला है।

 

पूर्णिमा सुमन

कवयित्री/लेखिका

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