तीरथ में हो ढूँढते, भगवन को इंसान।
अंतर्मन को झाँक तू, परम तत्त्व पहचान।।
तीरथ तो है नैन सुख, नहिं भगवन का वास।
मन के भीतर राम हैं, जो है सबके पास।।
तन-मन-धन सब वार के, तीरथ घूमे नेक।
लगा भला क्या हाथ है, जरा बताओ एक।।
शांति मिले यह सोचकर, जाते तीरथ लोग।
शांति कहाँ मिलती उन्हें, जिन्हें स्वार्थ का रोग।।
कैसी पूजा-अर्चना, ध्यान कहीं है और।
चोरी से भयभीत हो, ताके गठरी ठौर।।
चार धाम तीरथ गए, ओढ़ भक्ति का रूप।
उनका करो विचार जो, दिनभर सहते धूप।।
जा गंगा-गोदावरी, किए स्नान अरु दान।
इससे तो बस तन धुला, मन का भी कर ध्यान।।
तीरथ जाकर क्या भला, मिल जाता भगवान!
इंसानों में ही उसे, खोज भ्रमित नादान।।
मन पवित्र ही तीर्थ है, तन तेरा है धाम।
मन में निर्मल प्रेम जब, तन से हो शुभ काम।।
-द्रौपदी साहू
छुरी कला, कोरबा, छत्तीसगढ़




