
जिस देश की गद्दी पर बैठी स्वयं एक नारी है,
उसी वतन में आज हर एक बेटी क्यों बेचारी है?
कहाँ गया वो क़ानून, इंसाफ़ की बोलियाँ कहाँ गईं,
नेताओं की वो बड़ी-बड़ी खोखली दलीलें कहाँ गईं?
कहा जाता था—”यह देश है तुम्हारा, नेता तुम्ही हो कल के”,
पर रक्षक ही लूट रहे हैं, मासूम कलियाँ मसल के।
जिसने अभी ठीक से दुनिया का रंग भी नहीं देखा था,
जिसकी किस्मत में अभी सिर्फ़ बचपन का सवेरा था।
कल का उगता सूरज भी वो मासूम देख न पाई,
दरिंदों ने उसकी खिलखिलाती दुनिया ही मिटाई।
कुर्सी के भूखे हाकिमों, अब तो आँखें खोलो,
सच्चाई अगर बची है, तो कुछ तो मुँह से बोलो।
जब तक हर एक बेटी को महफ़ूज़ आसमाँ नहीं मिलेगा,
इस देश का कोई भी सूरज फिर गर्व से नहीं उगेगा।
ये कलम अब थमेगी नहीं, ये सवाल हर बार करेगी,
जब तक इस सोई हुई व्यवस्था की रूह नहीं जगेगी।
लेखिका ✍️ ज्योति बरनवाल, नवादा (बिहार)



