
मैं क्या कहूं दोस्तो कि नन्ही सी कली का,
खिलना अभी बाकी है।
चंद सांसें ही तो ली मां के आंचल में,
आंचल में सोना अभी बाकी है।
खुल कर मुस्कुराई भी नहीं
मुस्कान का होंठों पर आना अभी बाकी है।
चार क़दम उठ चली भी नहीं,
पैर में छम छम का बजना अभी बाकी है।
मैं क्या कहूं दोस्तो कि ,
नन्ही सी कली का खिलना अभी बाकी है।।
यूं नोच गया उस कली को,
कली का फूल बनना अभी बाकी है।
न जाने क्यूं इंसान में कहीं,
शैतान बाकी है।
यूं पुकारती रही वो मुझे ,
ममता पे विश्वास अभी बाकी है।
मैं क्या कहूं दोस्तो कि नन्ही सी,
कली का खिलना अभी बाकी है।।
मैं नादान ना समझी पीड़ा उसकी,
नन्ही सी आंखों से आंसुओं का बहना अभी बाकी है।
कैसा तूफां आया जिंदगी में,
के संभल पाना अभी बाकी है।
मिटा दूं उसकी तन मन की पीड़ा अपने प्यार से,
मगर तेरी सांसों का चलना अभी बाकी है।
मैं क्या कहूं दोस्तो कि नन्ही सी,
कली का खिलना अभी बाकी है।।
ऐ खुदा दें सजा उन्हें भी खुद ,
की पीढ़ियों का आगे बढ़ना अभी बाकी है।
नौ महीने कोख में पाला था उसे,
रूह को उसकी सुकून मिला ना अभी बाकी है।
रोक लो इस अनर्थ को कहीं ऐसा न हो,
घर आंगन से दीपक का बुझना अभी बाकी है।
खतरे में है अस्तित्व नारी जाति का,
जल रही है लूट रही है बेटियां।
हर दहलीज पर सस्ंकारों की ,बेलों का मिलना अभी बाकी है।
मैं क्या कहूं दोस्तो कि नन्ही सी कली
का खिलना अभी बाकी है।
मां धरती की इस बगिया का मिट जाना अभी बाकी है।।
प्रिया काम्बोज प्रिया ✍🏻 स्वरचित रचना
13/6/21




